ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः | सर्वे भद्रान्नि पश्यन्तु, माँ कश्चिद्-दुःख-भाग-भवेत् ||     ॐ शांतिः शांतिः शांतिः                                                                   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष (विक्रम संवत 1982–2082)                                                                  

अध्यात्म


नमो महद्भ्यो नमो अर्भकेभ्यो नमो युवभ्यो नम आशिनेभ्यः। यजाम देवान् यदि शक्नवाम मा ज्यायसः शंसमा वृक्षि देवाः ।।१।।

(महद्भ्यः) बड़ों के लिए (नमः) नमस्कार ! (अर्भकेभ्यः) छोटों के लिए (नमः) नमस्कार ! (युवभ्यः) युवाओं के लिए (नमः) नमस्कार। (आशिनेभ्यः) वृद्धों के लिए (नमः) नमस्कार !

(यदि) यदि [हम] (शक्नवाम) समर्थ हों, [तो] (देवान्) देवों को (का) (यजाम) यजन करें।

(देवाः) हे देवलोगो ! (ज्यायसः) योग्यतर [व्यक्तियों) को (शंसम्) प्रशसित करने को [मैं] (आ) सर्वतः (मा) मत ([अ] वृक्षि) त्यागूँ !

[अर्थात् [मैंने] (आ) सर्वतः (मा) नहीं ([अ] वृक्षि) त्यागा है।]

नासदासीत्रो सदासीत् तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्। किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीगहनं गभीरम् ।।१।।

(१) (तदानीम्) तब (न) नहीं (असत्) असत् (आसीत्) था ! (नो) नहीं ही (सत्)

सत् (आसीत्) था। (न) नहीं (रजः) रजस् (= धूलिकण) (आसीत्) था ! (यत्) जो (परः) आगे (व्योमा) आकाश [भी] (नो) नहीं ही [था], [तो] (किम्) क्या (आ) सब ओर से (अवरीवः) आवरण का अभाव [था]? (कुह) कहाँ [और] (कस्य) किसके (शर्मन् = शर्मणि) आश्रय में (गहनम्) गहन [तथा] (गभीरम्) गम्भीर (अम्भः) जल (किम्) क्या [विद्यमान] (आसीत्) था?

न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न राच्या अह्न आसीत्प्रकेतः। आनीदवातं’ स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किं चनास ।।२।।

(न) नहीं (मृत्युः) मृत्यु (आसीत्) था ! (तर्हि) तो (अमृतम्) अमरत्व [भी] (न) नहीं [था]!

(न) नहीं (रात्र्या) रात्री से (के) [(सह) साथ] (अहनः) दिन का (प्रकेतः) प्रज्ञान [भी] (आसीत्) था!

[परन्तु] (स्वधया) स्वसत्ता से [विद्यमान (तत्) वह (एकम्) एक (अवातम्) निश्चल [तत्त्व] (आनीत्) प्राणरूप में था !

(तस्मात्) उससे (अन्यत् अन्य किम् कोई चन भी परः परं (ह) निश्चय से (न) नहीं (आसीत्) था!

तम आसीत् तमसा गूळ्हमग्रेऽप्रकेत सलिलं सर्वमा इदम् । तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत् तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ।।३।।

(३)(अग्रे) पहले (गूळ्हम्) गूढ (तमः) तमस् (= अन्धकार) (तमसा) तमस् से (= अन्धकार से) [ही व्याप्त] (आसीत्) था।

(अप्रकेतम्) ठीक से जानने में असम्भव (इदम्) यह (सलिलम्) जल (सर्वम्) सब [ओर] (आ:) फैला हुआ था!

[उसमे] (यत्) जो (तुच्छ्येन) अतिसूक्ष्मता से (अपिहितम्) गुप्त रखा हुआ (आभु) बहुव्यापक [तत्त्व] (आसीत्) था, (तत्) वह (एकम्) एक [अपने] (तपसः) तप की (महिना) महिमा से (अजायत) प्रकट हुआ !

०००५

कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्। सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ।।४।।

(४) (यत्) जो (मनसः) मन का (प्रथमम्) पहला (रेतः) शुक्रबीज (आसीत्) था, (तत्) वह (अग्रे) पहल (कामः) काम [के रूप मे] (अधि) उच्चता पर (सम्) बहुत (अवर्तत) वर्तमान रहा !

(कवयः) कवियों ने (मनीषा मनीषया) मन से गृहीत प्रज्ञा से (हृदि) हृदय में (प्रति) पुनः (इष्य) देख करके (असति) असत् में (सतः) सत् के (बन्धुम्) बन्धन को (निः) नितराम् (अविन्दन्) प्राप्त किया।

०००६

तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्। रेतोधा आसन् महिमान आसन् त्स्वधा अवस्तात् प्रयतिः परस्तात् ।।५।। (५)

०००४

(२०१०.१२९३. ऋषिः प्रजापतिः परमेष्ठी। देवता- भाववृत्तम्। छन्दः निवृत् त्रिष्टुप्।) ०००५ (२०१०,१२९४; ऋषिः प्रजापतिः परमेष्ठी। देवता-भाववृत्तम्। छन्दः त्रिष्टुप्। द्र०अ० १९५२१ पृ०) मनसा गृहीता दृष्टा वा ईषा प्रज्ञा, ‘मनीषा’ तया, मनीषया। ‘ईष’ गति (ज्ञान) हिंसादर्शनेषु (१, ४०६) (२०१०,१२९५ ऋषिः प्रजापतिः परमेष्ठी। देवता- भाववृत्तम्। छन्दः त्रिष्टुप्।

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