30 May 2025
कुप्पाहाली सीतारमय्या सुदर्शन का जन्म 18 जून 1931 को रायपुर (छत्तीसगढ़) में एक कन्नड़ भाषी परिवार में हुआ था। के एस सुदर्शन के पिता श्री सीतारामैया वन-विभाग की नौकरी के कारण अधिकांश समय मध्यप्रदेश में ही रहे और वहीं श्री सुदर्शन जी का जन्म हुआ। सुदर्शन मूलतः तमिलनाडु और कर्नाटक की सीमा पर बसे कुप्पहल्ली (मैसूर) ग्राम के निवासी थे। कन्नड़ परम्परा में सबसे पहले गांव, फिर पिता और फिर अपना नाम बोलते हैं। तीन भाई और एक बहिन वाले परिवार में सुदर्शन जी सबसे बड़े थे। सुदर्शन की प्रारंभिक शिक्षा रायपुर, दामोह, मंडला और चंद्रपुर में हुई। महज 9 साल की उम्र में ही उन्होंने पहली बार आरएसएस शाखा में भाग लिया। उन्होंने वर्ष 1954 में जबलपुर के सागर विश्वविद्यालय (इंजीनिरिंग कालेज) से दूरसंचार विषय (टेलीकाम/ टेलीकम्युनिकेशंस) में बी.ई की उपाधि प्राप्त कर प्रारम्भिक जिला, विभाग प्रचारक आदि की जिम्मेदारियों को सफलतापूर्वक निभाने के बाद वो 1964 में 23 साल की उम्र में पहली बार सुदर्शन आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक बने। संघ में परंपरा है कि पूर्णकालिक प्रचारक विवाह नहीं करते हैं। उन्होंने भी इस परंपरा का निर्वाह करते हुए सारा जीवन देश और संगठन को समर्पित कर दिया। सर्वप्रथम उन्हें रायगढ़ भेजा गया। बाद में वे मध्य प्रदेश के प्रांत प्रचारक बने। इसके बाद संघ में उन्होंने कई तरह की अहम जिम्मेदारियां संभाली। 1969 में उन्हें ऑल इंडिया आर्गेनाइजेशन का कंवेनर बनाया गया। वह इस पद पर क़रीब उन्नीस वर्ष तक रहे।
सर्व समावेशी दर्शन के आलोक में हिंदुत्व ही राष्ट्रत्व है। सभी को एक मानना ही हिंदुत्व है। वसुधैव कुटुम्बकम् अंतरात्मा में निहित है। “सर्वे भवन्तु सुखिन:” मूल तत्व है और सेवा ही धर्म है। राष्ट्र और समाज के लिए सर्वस्व अर्पित करना, यह मूल भाव है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का। सन् 1925 में महान् स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार ने विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी। तभी से संघ ने न केवल स्वतंत्रता संग्राम वरन हर संकट काल में अपना सर्वस्व अर्पित कर देश और समाज की रक्षा की है। यह क्रम अनवरत प्रवहमान है। राष्ट्रीय आपदाओं और आपातकालीन परिस्थितियों में संघ के कार्यकर्ताओं ने बलिदान देकर तिरंगे की आन -बान -शान बनाए रखी। बाढ़ हो या फिर भूकंप, जहां भी त्रासदी आई वहां संघ के कार्यकर्ता सेवा करने पहुंच जाते हैं। मेघों की गर्जना हो या ठिठुरती रातें या फिर गर्म हवा के झोके, ये हर मौसम में तैयार रहते हैं। संकल्प यही कि देश की सेवा कर लोगों की जीवन रक्षा कर सकें। राष्ट्रत्व की भावना से लेकर 1925 में जो बीज बोया गया था वह आज देश में कई शाखाओं और अनेक स्वरुपों में दृष्टिगोचर होता है। संघ के हर स्वयंसेवक यही चाहता कि देश सेवा में ही उसकी पूर्णाहुति हो और भारत परम वैभव पर आरुढ़ हो।
तीन बार जबलपुर आए थे डॉ. हेडगेवार
संघ के वरेण्य स्वयंसेवकों एवं श्री दीपक मुंजे जी से प्राप्त जानकारी और दस्तावेजों के अनुसार संस्कारधानी में भी बड़ी संख्या में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता राष्ट्रत्व की भावना के साथ कार्य कर रहे हैं। यहां संघ के प्रथम सरसंघचालक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार जी ने पहली शाखा में गौरवमयी उपस्थिति दर्ज कराई थी। डॉ. हेडगेवार का तीन बार जबलपुर प्रवास हुआ था। 2 मार्च 1936 को वे पहली बार जबलपुर में एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने आए थे तब उन्होंने संघ की पहली शाखा में अपनी गरिमामयी उपस्थिति से सभी स्वयंसेवकों को भाव-विभोर कर दिया था। कृष्ण कुंज में संघ कार्यालय था और शाखा लगती थी। तब पहले नगर संघचालक की कमान पंडित कुंजीलाल दुबे को दी गई थी। उसके बाद 24 मार्च 1939 में जबलपुर और नरसिंहपुर में डॉ. हेडगेवार का आगमन हुआ। वे तीसरी बार 20 अप्रैल 1940 को जबलपुर आए थे। तीनों में में डॉ. हेडगेवार में संघ के साथ स्वाधीनता संग्राम में सहभागिता के लिए प्रेरित किया।












