29 May 2025
मधुकर दत्तात्रेय देवरस ऊर्फ बाळासाहेब देवरस (जन्म : ११ डिसेंबर १९१५; – १७ जून १९९६) हे भारतातील राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या हिंदुत्ववादी संघटनेचे सरसंघचालक होते.
बाळासाहेब देवरस यांच्यावरील पुस्तके
देवरस पर्व (विराग श्रीकृष्ण पाचपोर). या पुस्तकाला विदर्भ साहित्य संघाचा पुरस्कार मिळाला आहे.
राष्ट्रधर्मी संघयोगी – बाळासाहेब देवरस
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक थे श्री मधुकर दत्तात्रेय देवरस, जिन्हें ‘बालासाहब देवरस’ के नाम से जाना जाता है। वे स्वयंसेवकों के उस पहले समूह में से थे, जिन्होंने डॉ. हेडगेवार द्वारा नागपुर के मोहिते बाड़ा में शुरू की गई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली शाखा में भाग लिया था। (यद्यपि संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन की गई थी, परंतु पहली दैनिक शाखा कुछ महीनों के बाद 1926 में शुरू हुई थी।)
बालासाहब के साथ प्रथम स्वयंसेवकों के दल में केशवराव वकील, त्र्यंबक झिलेदार, अल्हाड़ अंबेडकर, बापू दिवाकर, नरहरि पारखी, बाली यशकुण्यवर, माधवराव मुले और एकनाथ रानाडे शामिल थे। ग्यारह वर्षीय बालासाहब निर्विवाद रूप से उन सबके नेता थे और उनके साथी हमेशा ही से उनसे प्रेरणा पाते थे, यद्यपि रानाडे उनसे उम्र में एक वर्ष तथा मुले तीन वर्ष बड़े थे। बाद में रानाडे और मुले दोनों सरकार्यवाह बने और दोनों ने संघ के विकास में उत्कृष्ट भूमिका निभाई।
दत्तात्रेय देवरस और पार्वतीबाई के सुपुत्र थे बालासाहब। आरंभ में उनके पिता को यह पसंद नहीं था कि बालासाहब और उनके छोटे भाई भाऊराव संघ के संगठनात्मक कार्यों में भाग लें।
दोनों भाई प्रतिभाशाली छात्र थे। इस कारण उनके पिता चाहते थे कि बालासाहब भारतीय सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करें। बालासाहब के छोटे भाई भाऊराव का जन्म 19 मई, 1917 के दिन हुआ था। 1925 में जब संघ की स्थापना की गई, तब देवरस परिवार नागपुर में इतवारी मोहल्ले में रहता था।
बालक बालासाहब जब छठी कक्षा में पढ़ते थे, तभी उन्होंने पहली बार संघ की शाखा में प्रवेश लिया। वे अपने साथ कई दोस्तों को भी शाखा में ले गए, जहां पर शामरावजी गाडगे गण शिक्षक थे। स्कूली बच्चों का यह दल वहां खेला करता और गाडगे से बहादुरी की कथाएं सुना करता। कुछ समय के बाद बालासाहब ने अपने छोटे भाई भाऊराव को भी संघ से जोड़ दिया। वे हमेशा साथ-साथ रहा करते थे और एक-दूसरे से बहुत स्नेह करते थे।
एक बार बालासाहब ने अपनी मां से कहा, ‘‘संघ के मेरे कुछ मित्र भोजन करने के लिए आएंगे, परंतु मैं चाहता हूं कि उन सबको मेरी तरह सम्मान प्राप्त हो, चाहे वे किसी भी जाति से संबंध रखते हों। उन्हें भोजन उन्हीं बर्तनों में परोसा जाए, जिनमें हमारा परिवार खाता है। मैं जाति के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं चाहता।’’ इस पर मां ने अपनी सहमति प्रदान कर दी और उसी दिन से जब वे उनके घर खाना खाने के लिए आए, देवरस परिवार में स्वयंसेवकों की जाति को लेकर कभी कोई प्रश्न नहीं पूछा गया। उस काल में देश में यह एक असाधारण बात थी, उन दिनों जाति-संबंधी भेदभाव अत्यधिक प्रचलित था।












