04 Aug 2025
पहाड़ का लोकसंगीत
थड़िया, चौंफला, बाजूबंद, न्यौली, और झूमेलो उत्तराखंड के पारंपरिक लोकनृत्य और गीत हैं, जिनका समृद्ध सांस्कृतिक इतिहास है। ये नृत्य और गीत पहाड़ी समाज की दैनिक जीवन शैली, मौसमी त्यौहारों, सामाजिक उत्सवों और धार्मिक अवसरों से गहराई से जुड़े हुए हैं। इन सभी विधाओं में कुछ समानताएं होने के बावजूद, इनमें कई विशेषताएँ और विविधताएँ हैं जो इन्हें अद्वितीय बनाती हैं।
थड़िया- थड़िया नृत्य विशेष रूप से गढ़वाल क्षेत्र में खेला जाता है और इसे मुख्यतः फसल कटाई के दौरान या वसंत ऋतु के उत्सवों में किया जाता है। यह नृत्य मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा किया जाता है और इसमें गोलाकार समूह बनाकर गीतों की धुन पर तालबद्ध तरीके से नृत्य किया जाता है। थड़िया में नृत्य की गति हल्की और नाजुक होती है और इसमें नर्तक और नर्तकियाँ अपने हाथों और पैरों के हलके आंदोलनों से तालमेल बिठाते हैं।
चौंफला-चौंफला नृत्य भी गढ़वाल और कुमाऊं दोनों क्षेत्रों में लोकप्रिय है लेकिन यह विशेष रूप से चैत में होली और अन्य अवसरों पर किया जाता है। इस नृत्य में पुरुष और महिलाएँ दोनों भाग लेते हैं। इसमें समूह के लोग हाथों में हाथ डालकर तेजी से गोलाकार घूमते हैं और पारंपरिक गीतों पर नृत्य करते हैं। चौंफला में संगीत का लय तेज होता है, जो वातावरण में उमंग और उल्लास भर देता है।
बाजूबंद-बाजूबंद एक पारंपरिक गीत है
जो मुख्यतः कुमाऊं क्षेत्र में लोकप्रिय है। इस गीत का उपयोग प्रेम और संबंधों को व्यक्त करने के लिए किया जाता है और इसमें महिलाएँ और पुरुष दोनों भाग लेते हैं। बाजूबंद का नृत्य साधारण होता है और इसमें व्यक्ति अपने साथी के साथ गाते हुए धीमे धीमे नृत्य करते हैं। बाजूबंद गीत में प्रेम और भावनात्मक अभिव्यक्ति की प्रमुखता होती है।
न्यौली-न्यौली एक प्रकार का पहाड़ी लोकगीत है जिसे मुख्य रूप से गढ़वाल और कुमाऊं के ग्रामीण क्षेत्रों में गाया जाता है। यह गीत विशिष्ट रूप से अकेले व्यक्ति द्वारा गाया जाता है और इसमें विरह और
प्रेम का गहरा चित्रण होता है। न्यौली गीत की धुनें दर्द और अकेलेपन को व्यक्त करती हैं और इसे बहुत भावुकता से गाया जाता है। न्यौली के गीत धीमे और संवेदनशील होते हैं जिसमें गायक अपनी भावनाओं को गहरे स्तर पर अभिव्यक्त करता है।
झूमेलो-झूमेलो भी उत्तराखंड का एक प्रसिद्ध लोकगीत और नृत्य है जो विशेष रूप से त्यौहारों और शादी-ब्याह के अवसरों पर किया जाता है। इसमें महिलाएँ और पुरुष दोनों भाग लेते हैं। झूमेलो में तेज गति से गोलाकार घूमते हुए समूह नृत्य किया जाता है। यह नृत्य आमतौर पर होली, दिवाली और अन्य प्रमुख उत्सवों पर देखने को मिलता है।
इन सभी नृत्य और गीतों का इतिहास उत्तराखंड के समाज और संस्कृति से गहराई से जुड़ा हुआ है। इनके माध्यम से न केवल मनोरंजन किया जाता है बल्कि सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संदेश भी दिए जाते हैं। पहाड़ी जीवन की कठिन परिस्थितियों में ये नृत्य और गीत लोगों को सामाजिक रूप से एकजुट रखते हैं और सामुहिक रूप से उनके संघर्षों और खुशियों को व्यक्त करते हैं। इनकी उत्पत्ति हजारों साल पहले हुई मानी जाती है, जब लोग खेती, प्राकृतिक संसाधनों, और धार्मिक आस्थाओं से जुड़े हुए होते थे। इन पारंपरिक नृत्य और गीतों में कई प्रकार के वाद्य यंत्रों का उपयोग होता है। प्रमुख वाद्य यंत्रों में शामिल हैं-
हुड़का-एक पारंपरिक ढोलक के समान वाद्य यंत्र, जो प्रमुख रूप से थड़िया और चौंफला नृत्य में बजाया जाता है।
दमाऊं यह भी एक प्रकार का ढोलक है जो विशेष रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बजाया जाता है।
बीन/मशकबीन-इसे बैगपाइप की तरह बजाया जाता है और खासकर न्यौली गीतों में उपयोग किया जाता है।
रणसिंघा-यह एक धातु का वाद्य यंत्र है जिसे धार्मिक और सांस्कृक्तिक आयोजनों में बजाया जाता है।
डौंरा-यह एक प्रकार का ढोल होता है, जो समूह नृत्यों में ताल देने के लिए इस्तेमाल
किया जाता है। इन नृत्यों और गीतों में पुरुष और महिलाएँ दोनों ही भाग लेते हैं, लेकिन कुछ नृत्य जैसे थड़िया मुख्य रूप से महिलाओं द्वारा खेले जाते हैं, जबकि चौंफला और बाजूबंद में दोनों का समान योगदान होता है। न्यौली गीत आमतौर पर पुरुष गायक द्वारा गाया जाता है जबकि झूमेलो में पुरुष और महिलाएँ दोनों एकसाथ नृत्य करते हैं। जौनसार क्षेत्र, जो उत्तराखंड का एक विशेष सांस्कृतिक क्षेत्र है, में इन नृत्यों और गीतों को विशेष नाम से पुकारा जा सकता है। उदाहरण के लिए, जौनसार बावर क्षेत्र में चौंफला को कभी-कभी अन्य नामों से भी जाना जाता है, लेकिन इसकी मूल संरचना समान रहती है। उत्तराखंड के ये पारंपरिक नृत्य और गीत भारत के अन्य राज्यों में नहीं खेले जाते क्योंकि इनकी जड़ें स्थानीय संस्कृति में गहराई से बसी हैं। हालांकि, उत्तराखंड से बाहर रहने वाले प्रवासी इन नृत्यों को अपने त्यौहारों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान प्रस्तुत करते हैं। दुनिया भर में बसे उत्तराखंडी प्रवासी अपने सांस्कृतिक त्योहारों पर इन नृत्यों का आयोजन करते हैं, खासकर जहाँ उत्तराखंड की जनसंख्या बड़ी संख्या में निवास करती है। संबंधित शोधपत्र और पुस्तकें इन पारंपरिक नृत्यों और गीतों पर अब तक अनेक शोध और पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। इनमें से कुछ प्रमुख पुस्तकें और उनके लेखक इस प्रकार हैं-उत्तराखंड के लोकनृत्य- लेखक-डा. शेखर पाठक /कुमाऊँ और गढ़वाल का सांस्कृतिक इतिहास-लेखक-पीताम्बर दत्त बड़थ्वाल / गढ़वाल और कुमाऊं के लोकगीत और लोकनृत्य लेखक मंगला नाथ/ राग रागिनी-डा. मधुरी बर्थवाल इसके अलावा, शोधपत्र विभिन्न अकादमिक जर्नल्स में छपे हैं, जिनमें इन नृत्यों और गीतों के ऐतिहासिक और सामाजिक पहलुओं का गहराई से अध्ययन किया गया है। इन विधाओं का संरक्षण बहुत जरूरी हैं इस से समाज में एकता सद्भावना व अखंडता का संचार होता हैं। यह समुदायिकता के प्रतीक चिह्न हैं जिस से संगठन मजबूत होते हैं।
देवेश आदमी












