ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः | सर्वे भद्रान्नि पश्यन्तु, माँ कश्चिद्-दुःख-भाग-भवेत् ||     ॐ शांतिः शांतिः शांतिः                                                                   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष (विक्रम संवत 1982–2082)                                                                  
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‘माँ अब नहीं जाएगी’

in कविता/कहानी, प्रेरणा
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‘माँ अब नहीं जाएगी’
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30 Oct 2025

कहानी: ‘माँ अब नहीं जाएगी’

बात बहुत पुरानी नहीं, बस कुछ साल पहले की ही है — जब पहाड़ों के गाँव धीरे-धीरे खाली होने लगे थे।
विकास, नौकरी, शिक्षा और सुविधाओं की तलाश में लोग मैदानों की ओर भाग रहे थे।
कभी जिन रास्तों पर बच्चों की किलकारियाँ गूंजती थीं, वहाँ अब घास उग आई थी।
खाली घर, बंद दरवाजे, और पत्थरों से छनकर आती यादों की आवाज — यही रह गया था गाँवों का संगीत।
उत्तराखंड की मिट्टी में संस्कार और सजगता हमेशा रही है।
यहाँ की बेटियाँ भी जितना दूर तक स्कूल हो, उतनी दूर तक पैदल जाती हैं — शिक्षा की प्यास लेकर।
समाज में सदा से एक सभ्यता, एक जागरूकता रही है।
कहा जाता है कि सदियों पहले आक्रमणकारियों से सतत संघर्ष मुगल आक्रमणों से धर्म और संस्कृति पर संकट आया,
तो भारत के कई हिस्सों से लोग धर्म, संस्कृति, हिंदुत्व, ज्ञान,अपनी आस्था, अपने शास्त्र और परंपरा को बचाने के लिए
इन कठिन पहाड़ों में आ बसे। यह स्थान यहां रहने वाले बहादुर, साहसी,परिश्रमी, धर्म के प्रति सजग और सभ्य सामाजिक जीवन की समूहों की धरती रही है। कई अन्य स्थानों से आते गए।
कठिन पहाड़ काटकर खेत बनाए, रस्ते बनाए, वास्तु और आज की भवन निर्माण के इंजीनियरिंग से भी उन्नत,ऐसे स्थान पर गांव बसाए जहां पर प्राकृतिक आपदा कोई हानि ना पहुंचाए, प्राकृतिक जल श्रोत उनके नजदीक गांव बसाए ,गांव के मकानों का निर्माण ऐसे किया कि सर्दी ,गर्मी बरसात, जंगली जानवरों से सुरक्षित,।मवही की उपलब्ध सामग्री के आधार पर ,वही के शिल्प के आधार पर मकान जो आज भी अद्भुत है अपनी डिजाइन में शिल्प में। मुख्य द्वार खोली पर बने हुए गणेश की आकृति स्थानीय शिल्पीयों ने, जिनसे परस्पर प्रेम का रिश्ता है। हमारे गांव पुरखों की श्रम साधना की रचना है जिन्होंने, धर्म की जलधाराओं से जीवन रचा,
और हर कठिनाई में भी आत्मनिर्भरता की परंपरा को निभाया।
समय बदला, उत्तराखंड राज्य बना।
लोगों ने सपना देखा —
अब गाँव-गाँव में स्कूल होंगे, कारखाने खुलेंगे,
खेती और पर्यटन से समृद्धि आएगी,
जैसे हिमाचल, कश्मीर,के खेतों से पर्यटन से फसलों से, जड़ी बूटियों से खुशहाली उतरती है वैसे ही यहाँ भी आएगी।
परंतु हुआ उल्टा।
राजनीति ने वो रूप लिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।
नेतृत्व जनता का नहीं, अवसर का बन गया।
गाँव फिर और तेज गति से खाली होने लगे।
इसी दौर में एक गाँव था शिखरौ, जहाँ प्रताप की माँ — सुमित्रा देवी — अकेली रहती थीं।
प्रताप दिल्ली में सरकारी नौकरी करता था।
अच्छा घर, पढ़े-लिखे बच्चे, पत्नी, सब कुछ था।
लेकिन माँ वहीं पहाड़ में, अपनी गाय, अपने बगीचे, अपनी जलधारा,
और अपने कुत्ते “बादल” के साथ रहती थीं।
अब उम्र बढ़ चली थी।
बेटा बार-बार कहता, “माँ, अब आप दिल्ली चलो। अकेली कैसे रहेंगी?”
माँ मुस्करा देती — “यहाँ सब है बेटा, मुझे क्या कमी?”
पर इस बार प्रताप ने ठान लिया — अब माँ को अपने पास ले ही जाएगा।
घर में सब तैयारी चल रही थी।
बेटी से कहा गया — “देखो, दादी आएंगी, तुम्हें उनके कमरे का स्थान देना होगा।”
पत्नी से कहा — “माँ ने बहुत संघर्ष किया है, अब हमें उनकी सेवा करनी है।”
दिल्ली का परिवार भावुक और उत्साहित था।
उधर माँ ने भी तैयारी शुरू कर दी थी।
सोचा, गाय बेच दूँगी — “छोटी नर्सी” थी, पर बहुत दूध देती थी।
और बादल को पड़ोसी के हवाले कर दूँगी — “अभी तो दो साल का है, पर बड़ा शरारती है।”
सामान बाँधने लगी — बस दो जोड़ी कपड़े, कुछ पूजा के बर्तन,
और भगवान बदरीनाथ की तस्वीर।
तभी गाँव के बूढ़े दादा, शंभू प्रसाद जी, दरवाज़े पर आए।
बोले — “बहू, अब तुम भी जा रही हो?
अभी तो तुम्हारी उम्र में लोग खेत जोतते हैं, गाय-दूध निकालते हैं।
बीमार भी नहीं हो, अपने पैर पर हो।
बच्चे छुट्टियों में आते हैं — इस घर को किसके भरोसे छोड़ोगी?”
थोड़ी देर चुप रही माँ, फिर बस इतना बोली —
“अब क्या करें दादा, बच्चे कहते हैं अकेली मत रहो।”
प्रताप सुबह दिल्ली से चला और शाम होते होते घर पहुंच गया और वह अपनी ही कार लेकर आया की मां को लेकर जाना है तो आराम से आ जाएंगे जहां रुकना चाहिए कि रुकेगी घर से दूर गांव के लोग मिलने लगे हैं सबसे नमस्ते सेवा कुशलता की बातचीत हुई है सब कहते थे प्रताप सुना मां को लेकर जा रहा है प्रताप की आंखों में बचपन की यादें तराने सी छलक आई गांव के कितने ही घर खाली हो गए आकाश का इतना विस्तार दिल्ली में दिखता ही नहीं,निशा सुंदर बादलों की आकृतियां ऐसी है कहां मिलता है, सड़क ठीक गांव तक आ गई, बिजली के बल्ब कहीं टिमटिमा रहें हैं, खयालों विचरता अपने घर के चौक में आ गया। रात हो गई मां के साथ बहुत सी बातें की ।योजनाएं बनी ,क्या करेंगे कैसे आना जाना रखेंगे।मन तो देखो भटकता ही रहेगा।सब गांव घर ऐसे ही हो गया देखा जाएगा। दिल्ली में अभी सरकारी मकान है ।बच्चे कहां कैसे क्या करेंगे कौन जानता है मां जो उनको यहां की भाषा बोली के विषय में ज्यादा हम बता ही नहीं पाए।उन्होंने बहुत क्या देखा देखा छुट्टियों में दो-चार दिन आकर सैर सपाटा गांव का।मां बातों बातों में रोती थी मां से रोटी का कोर चबाया ही नहीं जा रहा था, बार यही खयाल आता था कि सब छूट रहा है सदा के लिए।
खाना खाते-खाते और फिर बर्तनों को सदा के लिए समेटने के लिए कुछ बर्तन रात को ही और कुछ फिर सुबह जाने से पहले नाश्ता बनाने के बाद बाहर रखकर मां रुंधे गले से न जाने कौन सा मार्मिक गीत गुनगुनाने लगी लगभग दबे स्वर में,आकाश बिजलियों से कौंधने लगा बिना बादल ही। कई सपने में खोया प्रताप फिर इस सुबह की प्रतीक्षा कर रहा था, सुबह हुई वही सूर्य भगवान के सीधे आंगन में दर्शन क्षितिज में लाली पक्षियों का कलरव ,फूलों पर तितलियों का मंडराना । दिवाली के बाद की रौनक अभी भी गुलजार थी। गांव भर के बचे घर गेंदें गुलाब और गुलदावरी के फूलों की मालाओं से सजे थे।है टिमटिमाते थे , सुमित्रा ने गाय और बछड़ी को खूंटे पर बांध दिया।कुत्ते को रोटी और दूध डाल दिया, ना बादल ने रोटी खाने की कोशिश की न ही गाय ने घास मुंह से लगाया, मां की आंखों के आंसू प्रताप देख रहा था निरंतर। मां का बड़बड़ाते जाना, देर करना प्रताप को असहज कर रहा था ,उसने कहा मां हम देर से निकलेंगे तो बहुत देर हो जाएगी। नाश्ता ज्यादा जरूरत नहीं है पर मां ने बनाया, प्रसाद कहां मिलेगा मां का तुरंत खेत की हरी सब्जियों को तुरंत बना देना मांडवे की रोटी और उसे पर रखा , मक्खन ,धरती , पीसा नमक फ़िर कहां मिलेगा, प्रताप ने नाश्ता किया और मां सब समेट कर धीरे-धीरे सब कुछ बंद करते हुए सजल आंखें कर,दरवाजे का ताला बंद करने लगी,
माँ ने दरवाज़ा बंद किया, चाबी निकाली, और कहा —
“चलो बेटा, अब यह आखिरी बार देख लूँ घर को।”
पर तभी बादल ने भौंकना शुरू किया।
गाय ने रंभाना शुरू किया। मां ने गांव के भुवन को कहा कि जब वो चली जाए तब बादल और नर्सी गाय बछड़ी गंगा को भेजना, सुना घर में देख नहीं सकूंगी।
जैसे पूरा घर कह रहा हो — “मत जा, यहीं रहो।”
माँ ने गाय के माथे पर हल्दी कुमकुम का तिलक लगाया,
थोड़ा गुड़ खिलाया, पैरों को छुआ और बोली —
“तू ही तो मेरी बेटी जैसी है।”
बादल को रोटी खिलाई, उसके सिर पर हाथ फेरा,
तो वो दूर भागकर फिर वापस आया और दुम हिलाने , उछल कर अपने पंजों से सुमित्रा देवी के गले तक लिपट गया।
प्रताप ने माँ का बैग उठाया, ब कंधे पर डाला,
और बोला — “चलो माँ, बस यही आखिरी बार।”
माँ ने घर की चाबी दरवाज़े में डाली,
पर फिर रुक गई।
शंभू प्रसाद जी की बात उसके मन में गूंज रही थी —
“जो गाँव छोड़ देता है, वो वापस नहीं लौटता।”
माँ ने एक लंबी साँस ली, आसमान की ओर देखा —
“यह धरती, यह घर, यही तो मेरी साँसों का घर है।
मैं नहीं जाऊँगी प्रताप।
तुम्हें दिल्ली में सब सुख मिले, पर मुझे यहीं रहना है।”
प्रताप अवाक रह गया।
माँ ने ताला खोल दिया।
घर में प्रवेश किया, दीपक जलाया, और कहा
“जो आया था, सब भगवान की मर्जी से आया।
अब जो बचेगा, वही मेरी तपस्या है।”
गाय फिर से रंभाई, बादल पास आकर लेट गया।
आँगन में तुलसी का पौधा झूमने लगा।
पहाड़ की हवा जैसे माँ के निर्णय का आशीर्वाद दे रही थी।
अंतिम पंक्तियाँ:
पहाड़ के घर सिर्फ पत्थरों के नहीं होते,
उनमें आत्मा बसती है।
और जब माँ कहती है — “मैं यहीं रहूँगी,”
तो लगता है जैसे पहाड़ खुद बोल उठा हो —
“माँ, तुम जाओगी तो मैं भी सूना हो जाऊँगा।”

गजेन्द्र खंडूड़ी, देहरादून

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