24 May 2025
डा. केशवराव बलीराम हेडगेवार जी (1 अप्रैल 1889 -21 जून 1940) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक थे। हेडगेवार जी का जन्म महाराष्ट्र के नागपुर जिले में एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हिन्दू वर्ष प्रतिपदा के दिन हुआ था। आपके पिता का नाम पण्डित बलिराम पन्त हेडगेवार जी और माता का नाम रेवतीबाई जी था। माता-पिता ने पुत्र का नाम केशव रखा। पिता बलिराम वेद-शास्त्र एवं भारतीय दर्शन के विद्वान थे एवं वैदिक कर्मकाण्ड (पण्डिताई) से परिवार का भरण-पोषण चलाते थे। केशव राव जी का बड़े लाड़-प्यार से लालन-पालन होता रहा। उनके दो बड़े भाई भी थे, जिनका नाम महादेव और सीताराम था। बचपन से ही केशव राव हेडगेवार जी क्रांतिकारी प्रवृति के थे और उन्हें अंग्रेज शासको से घृणा थी। अभी विद्यालय में ही पढ़ते थे कि अंग्रेज इंस्पेक्टर के स्कूल में निरिक्षण के लिए आने पर केशव राव जी ने अपने कुछ सहपाठियों के साथ उनका “वन्दे मातरम्” जयघोष से स्वागत किया जिस पर वह बिफर गया और उसके आदेश पर केशव राव को स्कूल से निकाल दिया गया। तब उन्होंने मैट्रिक तक अपनी पढाई पूना के नेशनल स्कूल में पूरी की।
1910 में जब डॉक्टरी की पढाई के लिए कोलकाता गये तो कलकत्ते में श्याम सुन्दर चक्रवर्ती के यहाँ रहते हुए देश की नामी क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति से जुड़ गए और सक्रिय सदस्य बन गये। 1915 में नागपुर लौटने पर वह कांग्रेस में सक्रिय हो गये और कुछ समय में विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव बन गये। सन् १९१६ के कांग्रेस अधिवेशन में लखनऊ गये। वहाँ संयुक्त प्रान्त (वर्तमान यू०पी०) की युवा टोली के सम्पर्क में आये। 1920 में जब नागपुर में कांग्रेस का देश स्तरीय अधिवेशन हुआ तो डॉ॰ केशव राव बलीराम हेडगेवार जी ने कांग्रेस में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने के बारे में प्रस्ताव प्रस्तुत किया तो तब पारित नही किया गया। 1921 में कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन में सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी और उन्हें एक वर्ष की जेल हुई। तब तक वह इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि उनकी रिहाई पर उनके स्वागत के लिए आयोजित सभा को पंडित मोतीलाल नेहरु और हकीम अजमल खा जैसे दिग्गजों ने संबोधित किया।
कांग्रेस में पुरी तन्मन्यता के साथ भागीदारी और जेल जीवन के दौरान जो अनुभव पाए, उससे वह यह सोचने को प्रवृत हुए कि समाज में जिस एकता और धुंधली पड़ी देशभक्ति की भावना के कारण हम परतंत्र हुए है वह केवल कांग्रेस के जन आन्दोलन से जागृत और पृष्ट नही हो सकती। जन-तन्त्र के परतंत्रता के विरुद्ध विद्रोह की भावना जगाने का कार्य बेशक चलता रहे लेकिन राष्ट्र जीवन में गहरी हुई विघटनवादी प्रवृति को दूर करने के लिए कुछ भिन्न उपाय की जरूरत है। डॉ॰ केशव राव बलीराम हेडगेवार के इसी चिन्तन एवं मंथन का प्रतिफल थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से संस्कारशाला के रूप में शाखा पद्दति की स्थापना जो दिखने में साधारण किन्तु परिणाम में चमत्कारी सिद्ध हुई। इसी संस्था के माध्यम से वे अंग्रेजों को धूल चटाते रहे और भारत की आजादी की लड़ाई में सहयोग देते रहे।
1925 में विजयदशमी के दिन नागपुर में संघ कार्य की शुरुवात की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। इसके बाद भी उनका कांग्रेस और क्रांतिकारीयो के प्रति रुख सकारात्मक रहा। यही कारण था कि दिसम्बर 1930 में जब महात्मा गांधी द्वारा नमक कानून विरोधी आन्दोलन छेड़ा गया तो उसमे भी उन्होंने संघ प्रमुख (सरसंघ चालक) की जिम्मेदारी डॉ॰परापंजे को सौप कर व्यक्तिगत रूप से अपने एक दर्जन सहयोगियों के साथ भाग लिया जिसमे उन्हें 9 माह की कैद हुई। इसी तरह 1929 में जब लाहौर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में पूर्व स्वराज का प्रस्ताव पास किया गया और 26 जनवरी 1930 को देश भर में तिरंगा फहराने का आह्वान किया तो डॉ॰ हेडगेवार के निर्देश पर सभी संघ शाखाओं में 30 जनवरी को तिरंगा फहराकर पूर्ण स्वराज प्राप्ति का संकल्प किया गया।
इसी तरह क्रान्तिकारियों से भी उनके संबध चलते रहे | जब 1928 में लाहौर में उप कप्तान सांडर्स की हत्या के बाद भगतसिंह जी ,राजगुरु जी और सुखदेव जी फरार हुए तो राजगुरु जी फरारी के दौरान नागपुर में डॉ॰ हेडगेवार जी के पास पहुचे थे जिन्होंने उमरेड में एक प्रमुख संघ अधिकारी भय्या जी ढाणी के निवास पर ठहरने की व्यवस्था की थी। ऐसे युगपुरुष थे डॉ॰ केशव राव बलीराम हेडगेवार जी, जिनका जून सन् १९४० को निधन हो गया था, मृत्युपर्यन्त तक वे इस संगठन के सर्वेसर्वा रहे।












