ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः | सर्वे भद्रान्नि पश्यन्तु, माँ कश्चिद्-दुःख-भाग-भवेत् ||     ॐ शांतिः शांतिः शांतिः                                                                   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष (विक्रम संवत 1982–2082)                                                                  
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य पर हल्द्वानी में एकत्रीकरण कार्यक्रम ‘शताब्दी शंखनाद’

in नैनीताल, प्रदेश
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य पर हल्द्वानी में एकत्रीकरण कार्यक्रम ‘शताब्दी शंखनाद’
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05 Oct 2025

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य पर हल्द्वानी में एकत्रीकरण कार्यक्रम ‘शताब्दी शंखनाद’

हल्द्वानी : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य पर रविवार को एमबी इंटर कॉलेज, हल्द्वानी के मैदान में एकत्रीकरण कार्यक्रम शताब्दी शंखनाद का भव्य आयोजन किया गया। स्वयंसेवकों ने बांसुरी वादन के साथ बजते कुमाऊंनी लोक गीत दैणा होया खोली का गणेशा हे… की मधुर ध्वनि में योग और आसन का प्रदर्शन किया। इस विशाल आयोजन में 5000 से अधिक स्वयंसेवकों और नागरिकों ने प्रतिभाग किया। संघ के सह सरकार्यवाह श्रीमान आलोक कुमार जी मुख्य वक्ता रहे। उन्होंने संघ की स्थापना से महिषासुर से लेकर रावण का वध आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुआ। इसी लिए भारत में परंपरा बनी और राजाओं ने विजयदशमी को युद्ध प्रारंभ करने के शुभ दिन के रूप में चुना। ताकि विजयदशमी को यदि युद्ध शुरू करेंगे तो विजय अवश्य होगी। तभी से शस्त्र पूजन कर राज्य विस्तार की परंपरा, दुर्गा और श्रीराम की उपसना प्रारंभ हुई।

ये जानकर कि विजयदशमी के दिन जो काम प्रारंभ करेंगे उसमें विजय निश्चित है इसी भाव के साथ डा. केशव बलीराम हेडगेवार ने संघ की स्थापना के लिए भी इसी पावन दिन को चुना। संघ की स्थापना को 100 पूरे हो चुके हैं और 101 वें वर्ष में प्रवेश हो चुका है। स्वयंसेवकों ने इन वर्षों में देश और समाज के लिए जो किया वह एक लंबी गाथा है उसे कहना भी उचित नहीं है। क्योंकि संघ में निश्वार्थ भाव से समाज और देश की सेवा करना सिखाया जाता है। इसलिए सेवा को गाया नहीं जाता है।

आलोक जी ने कहा कि 100 वर्ष के दौरान क्या किया और क्या नहीं किया उसे छोड़कर जो अधूरे काम हैं आगे उन्हें पूरा करने का संकल्प लिया गया है। कहा जैसा समाज होना चाहिए वैसा नहीं है। हिन्दू समाज में अभी भी कई सारी कुरीतियां हैं, लोगों में अभी भी जैसी जागरूकता होनी चाहिए वैसी नहीं है। समाज को संगठित करने, सेवा और स्वावलंबन आदि विभिन्न पहलुओं को देखते हुए पंच परिवर्तन के बिंदु बनाए गए। जिसमें कुटुंबप्रबोधन, सामाजिक समरसता, स्वदेशी, पर्यावरण और नागरिक कर्तव्य बोध शामिल हैं। पंच परिवर्तन के विषय को लेकर संघ अभी 5.25 लाख परिवारों तक पहुंचा है, लेकिन आगामी वर्षों में प्रत्येक घर तक पहुंचने का लक्ष्य रखा गया है।

आलोक जी ने कहा कि हम परम वैभव की ओर बढ़ रहे है और इसमें समाज के प्रत्येक नागरिक का योगदान है। संघ शताब्दी वर्ष उपरांत हम 101 वर्ष में हमने प्रत्येक घर तक पहुंचने का लक्ष्य रखा है। उन्होंने इस बात को जोर देकर कहा कि अगले 10 से 15 वर्षों में हमने देश में पंच परिवर्तन के लिए समाज में काम करना है और इसकी शुरुआत सबसे पहले स्वयं से करनी है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ‘पंच परिवर्तन’ पांच प्रमुख सामाजिक और वैचारिक बदलावों का एक कार्यक्रम है जिसे हर घर तक पहुंचना है और जिसका उद्देश्य भारतीय समाज में सकारात्मक और रचनात्मक परिवर्तन लाना है।

पंच परिवर्तन का विस्तार :::
1.⁠ ⁠सामाजिक समरसता :
सामाजिक समरसता को संघ की विचारधारा का केंद्रीय बिंदु माना गया है। संघ का मानना है कि हिंदू समाज की स्वाभाविक विशेषता समरसता रही है, लेकिन समय के साथ जाति-भेद, ऊंच-नीच और अस्पृश्यता जैसी विकृतियां उत्पन्न हुईं, जिससे समाज के कुछ वर्गों को अन्याय और अपमान सहना पड़ा और उन्होंने कहा कि हमारे पहाड़ों में आज भी यह समाज में व्याप्त है। इस बुराई को त्याज्य मानते हुए संघ का आग्रह है कि समाज में सब समान हैं—इस भावना से सभी को जोड़कर यह एकत्व की स्थापना की जाए। संतों और समाज सुधारकों ने भी इसे पाप बताया है, और इसका समाप्त होना अत्यंत आवश्यक है।

2.⁠ ⁠पर्यावरण संरक्षण
श्री आलोक ने कहा कि दुनियां भर में जलवायु परिवर्तन का असर दिखाई दे रहा है,आने वाले समय में प्राकृतिक आपदाएं बहुत होंगी ऐसा भविष्य वक्ताओं ने संकेत दिए है धरती पर जितनी आबादी होनी चाहिए उससे अधिक हो गई है प्रकृति अपना संतुलन खुद बनाती है। उन्होंने कहा कि प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्वपूर्ण जीवनशैली अपनाना और पृथ्वी, जल, वायु जैसे संसाधनों की रक्षा करना, जल, जंगल जमीन को कैसे सम्भल कर रखे ऐसी चर्चा और प्रयास, परिवार में समाज में होने चाहिए। संघ मानता है कि मानव जीवन पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) पर आधारित है, और इनका संतुलन बिगड़ने से ही आज की पर्यावरणीय चुनौतियाँ खड़ी हुई हैं। भारतीय परंपरा में पेड़-पौधों और प्रकृति की पूजा का जो भाव है, वही सच्चे अर्थों में पर्यावरण संरक्षण का आधार है। संघ हर नागरिक से जल-बचत, वृक्षारोपण, स्वच्छता और ऊर्जा-संरक्षण को अपना कर्तव्य मानने का आग्रह करता है। यही भाव नव राष्ट्र-निर्माण की आवश्यकता है।

3.⁠ ⁠कुटुंब-प्रबोधन
कुटुंब (परिवार) को समाज की सबसे छोटी लेकिन सबसे प्रभावी इकाई माना गया है। ऋग्वेद और अथर्ववेद में परिवार को आनंद और समृद्धि का केंद्र बताया गया है। परिवार में हिन्दू जीवन-शैली, संस्कार और कर्तव्यों का पोषण कर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को जीवित रखना। संघ का मानना है कि स्वस्थ परिवार से ही स्वस्थ समाज और अंततः एक सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है। कहा कि प्रत्येक परिवार को सामाजिक शिक्षा और संस्कारों की पहली इकाई मानकर परिवार के सदस्यों के बीच संवाद, संस्कार, सहयोग को बढ़ावा देना आवश्यक है तभी हम दादा, दादी, ताऊ, चाचा बुआ आदि रिश्तों को संजो के रख पाएंगे। उन्होंने कहा कि इन पांच आयामों के जरिए संघ सामाजिक समरसता, पर्यावरण सुरक्षा, देशभक्ति, परिवार और राष्ट्रीय कर्तव्यों को समाज के हर स्तर पर मजबूत करना चाहता है। यही हमारा संघ शताब्दी वर्ष के बाद की योजना है।

4. स्व-आधारित जीवन
उन्होंने कहा कि हमारा खान, पान, भेष आदि स्वदेशी होना चाहिए। विदेशी दासता से मुक्त होकर अब स्वभाषा, स्वभूषा, स्वसंस्कृति और स्वदेशी उद्योगों पर बल देना आवश्यक है। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से अलग होना नहीं है, बल्कि स्वाभिमान के साथ व्यापार और उत्पादन करना है। उन्होंने कहा कि 100 नंबर का भी ध्यान रखना है हमारी माता बहने पहले के जमाने में आज पदों से समान वस्तु मिनिमाइज चलती थी और उसे आदान-प्रदान होता था और स्वदेशी चीजों का बढ़ावा होता था। संघ रक्षा, विज्ञान और तकनीक में आत्मनिर्भर भारत को प्रेरणास्रोत मानता है। स्थानीय व कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देकर रोजगार और आत्मनिर्भरता दोनों को बढ़ाना इस परिवर्तन का मुख्य ध्येय है।

5. नागरिक कर्तव्य बोध
उन्होंने कहा कि संविधान ने जहाँ हमें अधिकार दिए हैं, वहीं मौलिक कर्तव्यों का भी आग्रह किया है। राष्ट्रभक्ति केवल बड़े अवसरों पर नहीं, बल्कि दैनिक आचरण में झलकनी चाहिए—जैसे पानी-बिजली की बचत, ईंधन का संयमित उपयोग, हेलमेट का नियमित उपयोग , अनुशासन, ईमानदारी और शिष्टाचार भी राष्ट्रसेवा हैं। संघ का मानना है कि अच्छे और जिम्मेदार नागरिक ही किसी भी देश की आंतरिक शक्ति और स्थायी विकास का आधार होते हैं। अंत में उन्होंने कहा कि इन पाँचों परिवर्तनों को समाज जीवन में समय के अनुकूल लाकर ही हम राष्ट्रहित के महान कार्य को समग्रतापूर्वक कर सकते हैं। समाज संगठन हो सके इसलिए यह पांचो पर कार्य करना है और करते रहना चाहिए विश्व में हम सबसे मजबूत बने इसलिए हम सब स्वयंसेवक संघ के इस नियम पर काम करते हैं कि वह पहले खुद करते हैं और फिर वह और लोगों को उसके लिए कहते हैं इसलिए हमें पहले खुद करना इन पांचों कामों को और फिर और लोगों को साथ लेकर चलना है।

यह रहे मौजूद ::
प्रांत संघचालक डा. बीएस बिष्ट, सह प्रांत प्रचारक चंद्रशेखर, जिला संघचालक डा. नीलांबर भट्ट, नगर संघ चालक विवेक कश्यप, वरिष्ठ स्वयंसेवक जगन्नाथ पांडेय, वेद प्रकाश अग्रवाल, सह क्षेत्र सेवा प्रमुख धनीराम जी, सह प्रांत प्रचार प्रमुख डा. बृजेश बनकोटी, सह प्रान्त बौद्धिक प्रमुख राजेश जोशी, सह प्रांत व्यवस्था प्रमुख भगवान सहाय, सह विभाग प्रचारक डा. नरेंद्र जी, विभाग प्रचार प्रमुख उमेश शाह, जिला प्रचारक जितेंद्र, जिला कार्यवाह राहुल जोशी, जिला प्रचार प्रमुख एडवोकेट प्रदीप लोहनी, जिला शारीरिक प्रमुख सूरज, कमल, योगेश गोस्वामी, भुवन जोशी, डॉ नवीन शर्मा, धीरेश पांडे, आनंद मेऱ, अनुज गुप्ता, कमलेश त्रिपाठी, नगर कार्यवाह प्रकाश पांडे आदि मौजूद रहे।

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