09 Jan 2026
गो सेवा के लिए समर्पित महेन्द्र सिंह जी !
भारत की संस्कृति एवं इसके जनजीवन में गाय का विशेष महत्व है। इसे पशु न मानकर माता का स्थान दिया गया है, जिसके शरीर में 33 करोड़ देवताओं का वास कहा गया है और जो भगवान श्री कृष्ण की परम आराध्या है तथा भवसागर से पार लगाती है। गाय के दूध को अमृत के समान माना जाता है, जो माँ के दूध के समान पौष्टिक सुपाच्य और चेतना दायक होता है। यह स्मरण शक्ति बढ़ाता है तथा इसके सेवन से कोलेस्ट्रोल नहीं बढ़ता। छांछ का उपयोग औषधिक रूप में अनेक बीमारियों में किया जाता है। 10 ग्राम गौघृत जलने से 1 टन ऑक्सीजन उत्पन्न होती है। देशी गाय के गोमूत्र में स्वर्णक्षार होता है जो मेधा-शक्ति व पुष्टता को बढ़ाता है। इसमें कैंसर तथा डायबिटीज जैसे घातक रोगों से मुक्ति दिलाने की क्षमता है। गोमूत्र की सहायता से एण्टी-बायोटिक के साइड इफेक्ट में कमी हो जाती है। गोमूत्र में 24 प्रकार के रसायन, गोबर में 16 खनिज तत्व होते हैं तथा पंचगव्य तमाम रोगों के निदान के लिए आयुर्वेदिक विकल्प है।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के कुछ ही वर्षों बाद गौरक्षा के लिए 1952 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अखिल भारतीय संकल्प लिया गोपाष्टमी से गौरक्षा हस्ताक्षर शुरू किये। डॉ. हेडगेवार को गाय का तनिक सा भी अपमान सहन नहीं था और श्रीगुरुजी गौरक्षा के लिए कानून बनाने को सबसे पहला कार्य कहते थे। गौरक्षा के लिए आचार्य विनोवा भावे ने तो अनशन तक किया था। लोकमान्य तिलक ने स्वराज्य से बढ़कर गौरक्षा को माना और समाज को जगाने के लिए अनेक प्रदर्शनियाँ लगाई।
2009 में विजयदशमी से लेकर मकर संक्राति 2010 तक विश्व मंगल गौग्राम यात्राओं का आयोजन हुआ।
बढ़ते शहरीकरण, तेज आर्थिक गतिविधियों, कृषि एवं वन क्षेत्रों में कमी जैसे कई कारणों से घरों में गाय पालने का प्रचलन बहुत कम हो गया। बूढ़ी और बीमार गायों को सड़कों पर छोड़ देने से उन्हें अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता हैं, भोजन के अभाव में वे कबाड़ तक खाने को विवश होती हैं। इस गम्भीर एवं त्रासद स्थिति से उबरने के लिए गाय के प्रति सेवाभाव और समाज के स्वयं के प्रयास ही मुक्ति दिला सकते हैं। देश में कुछ स्थानों पर ऐसे प्रयास हुए हैं जहाँ स्वयंसेवी लोगों ने गोशालाओं व गोसेवा केन्द्रों के माध्यम से गायों के आश्रय और उपचार की व्यवस्था की है। उत्तराखण्ड में भी ऐसा श्रेष्ठ प्रयास टनकपुर में हो रहा है।
गौ सेवा ही जिनके जीवन का संकल्प बन गया
टनकपुर में ‘पंचमुखी महादेव गौसेवा धाम’ के माध्यम से गायों को आश्रय के साथ उनकी सेवा तथा उपचार का काम हो रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उत्तराखण्ड के पूर्व प्रान्त प्रचारक महेन्द्र सिंह ने इसे आरम्भ किया और अब यह जनता के सहयोग से बड़े पशु सेवा केन्द्र के रूप में चलाया जा रहा है। महेन्द्र सिंह टनकपुर के ही रहने वाले हैं पूर्णकालिक संघ प्रचारक के रूप में वे तहसील प्रचारक पूरनपुर, बदायूं जिला प्रचारक, बरेली महानगर प्रचारक, बरेली विभाग प्रचारक, बदायूं विभाग प्रचारक और आगरा विभाग प्रचारक रहने के बाद 2012 तक उत्तराखण्ड, में प्रान्त प्रचारक रहे। माता-पिता की सेवा के लिए महेंद्र सिंह ने 2012 में
एक साल तक चिकित्सा और सेवा के बाद उसका पाँव ठीक हुआ। माँ पर्णागीरी के दर्शन के लिए मुरादाबाद से तेज रफतार से सैन कार से कुछ युवा नौजवानों ने सड़क किन. बैठी गायों के झुण्ड पर कार चला दी, तीन गायें वहीं पर मर गईं। एक गाय को पंचमुखी महादेव गौसेवा धाम टनकपुर में चिकित्सा शुरू की। रात में ही उनके खिलाफ रिपोर्ट की गई। सुबह सुबह फिर उन तीनों गायों का अन्तिम संस्कार किया गया। काफी उपचार के बाद धाम में आई गाय स्वस्थ हो गई। स्वस्थ गायों के लिए टनकपुर में काला झाला में स्थानीय विधायक श्री कैलाश गहतोड़ी के सहयोग से नई गौशाला का निर्माण किया गया। ‘पंचमुखी महादेव गौसेवा धाम’ में अब सेवा कार्य का विस्तार अन्य बेजुबान पशुओं, बिल्ली, कुत्ता, बकरी आदि के लिए भी कर दिया गया है, वहाँ अब सभी की सेवा की जा रही है।
प्रचारक जीवन से घर वापसी की। माता-पिता की सेवा के साथ-साथ उनके मन में बीमार गायों की सेवा का विचार कौंधने लगा और वे असहाय, बीमार और घायल गायों की सेवा में लग गए। इसमें वे इतने रम गये कि उसके बाद ‘गौ सेवा’ ही उनके जीवन का लक्ष्य बन गया और इसलिए समर्पित हो गये। वे गायों को पशु चिकित्सालय ले जाते और वहाँ उनकी सेवा करते। ऐसी सेवा करते-करते पुरानी तहसील में ‘गौ सेवा केंद्र’ प्रारम्भ हो गया और उनके साथ अन्य सहयोगी भी जुड़ते चले गए, आज एक बड़ी टीम उनके साथ सेवा कार्य में जुटी है। गौ-सेवा की बड़ी पहचान बन रहे हैं। वे मात्र गायों की ही नहीं, बल्कि सभी प्रकार के पशुओं की सेवा करते हैं। बेजुबान पशुओं की चिन्ता और देखभाल के साथ महेन्द्र जी समाज में पशुओं के प्रति दया का भाव जगाते हैं। पशु क्रूरता को रोकने और उनकी सुरक्षा की दिशा में वे महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं।
भोजन के लिए सड़कों पर विचरती बूढ़ी व बेसहारा गायों के लिए ‘पंचमुखी महादेव गौसेवा धाम’ सहारा देने का बड़ा केन्द्र बना गया है। बीमार और और सड़क दुर्घटनाओं में घायल गायों की सेवा में केन्द्र की टीम मनोयोग से लग जाती है। पीलीभीत चुर्गी पर एक विशाल नन्दी बहुत घायल स्थिति में पड़ा था जिसके पाँव में गहरा जख्म था। गौ सेवकों के द्वारा उसे को गौधाम ले जाया गया। पाँव में कैंसर होने के
मार्च 2020 में हुए लॉकडाउन में सारे बाजार सब्जी मण्डी आदि बन्द होने से कुछ भी मिलना सम्भव नहीं था, ऐसी परिस्थिति में गायों के लिए खाने की व्यवस्था कठिन थी किन्तु उसके बाद भी गायों के साथ-साथ अन्य बेजुबान जानवरों के लिए व्यवस्था की गई। कोरोना में जानवरों को लेकर कई तरह की गलत खबर फैलने के बाद लोगो ने जानवरो को छोड़ना शुरू कर दिया था। कोरोना काल में चारे के सहयोग में परेशानी बहुत थी क्योंकि स्थानीय सभी दुकाने बन्द थीं। गायों की मदद के लिए ऑनलाइन सहयोग लेना शुरू किया, अपील की, संस्था के नाम बैंक अकाउण्ट दिया, जिसके तहत कई लोगों ने पशुचारा के लिए दान, हरी घास, सूखा, गुड़, दलिया, दवाईयाँ, पट्टियाँ, हरी सब्जियाँ आदि की व्यवस्था की, जिसके कारण पशुओं की सेवा होती रही। पंचमुखी गौ-सेवा धाम के माध्यम से महेन्द्र जी जिस तरीके से गौ सेवा कर रहे हैं उसकी जितनी प्रशंसा की जाए तो वह कम ही है।
पौड़ी में स्थित ज्वाल्पा देवी मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण में भी किया गया है। स्कंद पुराण में ज्वाल्पा देवी मंदिर को दीप्त ज्वालेशरी कहा गया है।
– प्रभाकर उनियाल












