ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः | सर्वे भद्रान्नि पश्यन्तु, माँ कश्चिद्-दुःख-भाग-भवेत् ||     ॐ शांतिः शांतिः शांतिः                                                                   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष (विक्रम संवत 1982–2082)                                                                  
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वर्ष प्रतिपदा पर हल्द्वानी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नगर पथ संचलन !

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वर्ष प्रतिपदा पर हल्द्वानी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नगर पथ संचलन !
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22 Mar 2026

हल्द्वानी, जनपद नैनीताल | हिंदू नववर्ष विक्रम संवत् 2083 के उपलक्ष पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हल्द्वानी द्वारा नगर पथ संचलन का आयोजित किया गया ।

हीरानगर में आयोजित एकत्रीकरण कार्यक्रम में उत्तराखंड प्रान्त के मा. प्रांत संघचालक प्रो. बहादुर सिंह बिष्ट जी, जिला संघचालक डॉ. नीलंबर भट्ट जी और नगर संघचालक विवेक कश्यप जी व सह-प्रांत प्रचारक चन्द्रशेखर जी ने संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी का पुण्य स्मरण कर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की।

सह-प्रांत प्रचारक चन्द्रशेखर जी ने बताया कि प्रतिपदा का यह शुभ दिन भारत राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। ब्रह्म पुराण के अनुसार चैत्रमास के प्रथम दिन ही ब्रह्मा ने सृष्टि संरचना प्रारंभ की। यह भारतीयों की मान्यता है, इसीलिए हम चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नव वर्ष का आरम्भ मानते हैं। यह समय दो ऋतुओं का संधिकाल है। इसमें रातें छोटी और दिन बड़े होने लगते हैं। प्रकृति नया रूप धारण लेती है। प्रतीत होता है कि प्रकृति नवपल्लव धारण कर नव संरचना के लिए ऊर्जास्वित होती है। मानव, पशु-पक्षी, यहां तक कि जड़-चेतन प्रकृति भी प्रमाद और आलस्य को त्याग सचेतन हो जाती है। वसंतोत्सव का भी यही आधार है। इसी समय बर्फ पिघलने लगती है। आमों पर बौर आने लगता है। प्रकृति की हरीतिमा नवजीवन का प्रतीक बनकर हमारे जीवन से जुड़ जाती है।

सहप्रांत प्रचारक चन्द्रशेखर जी ने बताया कि इसी प्रतिपदा के दिन आज से 2054 वर्ष पूर्व उज्जयनी नरेश महाराज विक्रमादित्य ने विदेशी आक्रांत शकों से भारत-भू का रक्षण किया और इसी दिन से काल गणना प्रारंभ की। उपकृत राष्ट्र ने भी उन्हीं महाराज के नाम से विक्रमी संवत कह कर पुकारा। महाराज विक्रमादित्य ने आज से 2054 वर्ष पूर्व राष्ट्र को सुसंगठित कर शकों की शक्ति का उन्मूलन कर देश से भगा दिया और उनके ही मूल स्थान अरब में विजयश्री प्राप्त की। महाराजा विक्रमादित्य ने भारत की ही नहीं, अपितु समस्त विश्व की सृष्टि की। सबसे प्राचीन कालगणना के आधार पर ही प्रतिपदा के दिन को विक्रमी संवत के रूप में अभिषिक्त किया। इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान रामचंद्र के राज्याभिषेक अथवा रोहण के रूप में मनाया गया। यह दिन ही वास्तव में असत्य पर सत्य की विजय दिलाने वाला है। इसी दिन महाराज युधिष्टिर का भी राज्याभिषेक हुआ और महाराजा विक्रमादित्य ने भी शकों पर विजय के उत्सव के रूप में मनाया। आज भी यह दिन हमारे सामाजिक और धार्मिक कार्यों के अनुष्ठान की धुरी के रूप में तिथि बनाकर मान्यता प्राप्त कर चुका है। यह राष्ट्रीय स्वाभिमान और सांस्कृतिक धरोहर को बचाने वाला पुण्य दिवस है।

उन्होंने बताया कि हमारी काल गणना महान है, जिसका वैज्ञानिक आधार है। हमारी काल गणना का आधार सूर्य और चंद्रमा की गति से होता है।हमारे सभी त्योहारों का आधार भी वैज्ञानिक है। आज नासा के वैज्ञानिक भी भारतीय परंपरा एवं संस्कृति पर खोज कर रहे हैं।
सह-प्रांत प्रचारक चन्द्रशेखर ने बौद्धिक देते हुए बताया कि जब- जब भारत माता की गोद में राष्ट्र पुनर्जागरण की आवश्यकता हुई तब-तब कुछ महापुरुषों ने अपने जीवन की आहुति देकर समाज को एक नई दिशा दी। ऐसे ही एक महान विभूति थे परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, जिनका जन्म केवल एक व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि राष्ट्र को पुनः जागृत करने की एक विचारधारा के रूप में हुआ था। डॉ. हेडगेवार जी ने माँ भारती की सेवा को ही अपने जीवन का परम ध्येय बनाया। उन्होंने अनुभव किया कि जब तक समाज संगठित नहीं होगा, तब तक भारत पुनः अपने गौरव को प्राप्त नहीं कर सकेगा। इसी उद्देश्य से उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की—एक ऐसा संगठन जो भारत की सांस्कृतिक आत्मा को जागृत कर राष्ट्र प्रथम की भावना को जन-जन तक पहुँचाने के लिए समर्पित हो।

सहप्रांत प्रचारक चन्द्रशेखर जी ने बताया कि आज जिस संघ रूपी वटवृक्ष की छाया में करोड़ों राष्ट्रभक्त सेवा, संस्कार और राष्ट्रनिष्ठा की साधना कर रहे हैं, वह उस बीज की ही देन है जिसे डॉ. हेडगेवार जी ने अपने त्याग, तपस्या और दूरदृष्टि से अंकुरित किया था। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन उनका लक्ष्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था वे भारत को आत्मगौरव, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और राष्ट्रभावना से ओतप्रोत देखना चाहते थे। डॉ. हेडगेवार जी केवल एक संगठन के संस्थापक ही नहीं थे बल्कि वे राष्ट्रीय पुनर्जागरण के महायज्ञ के यजमान भी थे। उनका संकल्प “हिंदू समाज को संगठित कर, उसे इतना जागरूक, शक्तिशाली और अनुशासित बनाना था जिससे वह राष्ट्र की रक्षा और उत्थान में अपनी भूमिका निभा सके। आज जब भारत विकसित भारत बनने की ओर बढ़ रहा है, जब देश में राष्ट्रवाद, आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक गौरव का भाव प्रबल हो रहा है, तब हम डॉ. हेडगेवार जी की दूरदृष्टि और उनके योगदान को और अधिक सम्मान के साथ याद करते हैं।

उन्होंने बताया कि ‘संघे शक्ति कलयूगे’ कलयुग में संगठन की शक्ति ही सबसे बलशाली होती है। इसलिए सभी स्वयंसेवकों को एकत्रित होना चाहिए। हमारे पूर्वज शिवाजी महाराज , महाराणा प्रताप जैसे अनेक महापुरुषों ने समाज व राष्ट्र के कल्याण के लिए समाज को संगठित करने का कार्य किया है। भारत विश्व को ज्ञान देने और चक्रवर्ती सम्राटों की जन्मस्थली वाला देश है। जब तुर्की के खलीफा को गद्दी से उतारा तो कुछ विशेष समुदाय के लोगों ने भारत के अंदर आंदोलन किया और केरल में 2000 लोगों का कत्लेआम हो गया। इसलिए हमें जाति, पंथ वर्ग, भेद और रूढ़ियों का त्याग करके प्रत्येक परिस्थितियों के लिए तैयार रहने की आवश्यकता है। इसलिए उन्होंने सभी स्वयंसेवकों एवं हिन्दू समाज से आवाहन किया कि इस शुभ अवसर पर हम राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का संकल्प लें, अपने जीवन को भारत माता की सेवा में समर्पित करें और परम पूज्य डॉ हेडगेवार के सपनों के भारत के निर्माण में अपना योगदान दें।

पथ संचलन के अवसर पर मा. प्रांत संघचालक डॉ. बहादुर सिंह बिष्ट जी, जिला संघचालक डॉ. नीलांबर भट्ट जी, नगर संघचालक विवेक कष्यप जी, जिला प्रचारक जितेंद्र जी,विभाग प्रचार प्रमुख उमेश साह जी, नगर प्रचारक प्रभाकर जी, सह जिला प्रचार प्रमुख भुवन जी, मुख्य शिक्षक कमल जी,नगर कार्यवाह प्रकाश पाण्डेय जी, सह-नगर कार्यवाह तनुज गुप्ता जी, प्रहलाद मेहरा जी, जिला शारीरिक प्रमुख सूरज तिवारी जी, जिला सह-बौदिक प्रमुख कमलेश त्रिपाठी जी, नगर बौद्धिक प्रमुख मनोज जी, नगर प्रचार प्रमुख डॉ. नवीन शर्मा जी, उपनगर कार्यवाह नितिन ललित जी, हिंमाशु जी, रूपचन्द्र जी समेत सैकड़ों स्वमंसेवक बंधु उपस्थित रहे।

 

 

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