30 Oct 2025
दिवाली पहाड़ से उतरकर!
अमावस की वह रात थी
गहरी स्याह और सर्द।
आकाश पर तारे ऐसे जैसे किसी ने
गगन में दीप जलाए हों।
शरद की हवा में घुली थी
धान की महक, गोठ की रुनझुन,
गायों के गले में फूलों की माला,
माथे पर हल्दी-सिंदूर का टीका।
न बिजली थी, न था तारों का शोर,
फिर भी उजियारा हर आँगन में भरा था ।
दीयों से, मनों से, स्नेह से।
माँ चौके में छज्जों पर दीप धरती,
सब मिल कर आरती उतारते,
सुबह से ही उत्साहित बाल मन
“जय जय करा दीपावली माँ!”
पर्व था… पर बाज़ार नहीं,
रोशनी थी… पर लड़ी नहीं।
ढोल दामों की थाप पर नाचते थे गाँव,
उत्सव उमंग गीत,भेलो रे भेलो
नदी तक गूँजती थी वह हँसी
जो अब शहर के काँक्रीट में खो गई है।
अब तो बिजली हर पहाड़ पर है,
पर उजाला मन में नहीं।
घर हैं… लोग नहीं।
गाँव खामोश,
जहाँ कभी हर दीप की लौ में
किसी की प्रतीक्षा जलती थी।
शहर में चकाचौंध है
पटाखों की गर्जना,
बिजली की लड़ियों की जगमग
शहर में मिट्टी भी फूल भी सब
बाजार है पैसों का ।
रस्ते गाड़ियों के क्रंदन में
लोग दिखावे और औपचारिकता के बंधन में
बिसर गए दीपोत्सव बस धन की खनक है कहीं
पर न वह सन्नाटा जो मन को सुनाता था,
न वह गीत जो अंधेरे में आत्मा को जगाता था।
कहाँ चली गई वह दीपावली
जो मिट्टी की गंध में मुस्कुराती थी?
जो अँधेरे से नहीं डरती थी,
बल्कि उसी में उजाला रचती थी।
अब तो बस याद बची है
पहाड़ की उस रात की,
जहाँ दीप छोटे थे,
मगर उजाले की जगमग अनन्त थी ।
– गजेन्द्र खंडूड़ी












