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होम व्यक्तित्व उत्तराखंड की महान विभूतियाँ

चन्द्र सिंह गढ़वाली जी

in उत्तराखंड की महान विभूतियाँ, व्यक्तित्व
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चन्द्र सिंह गढ़वाली जी
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03 Jul 2025

उत्तराखण्ड की महान विभूति चन्द्र सिंह गढ़वाली जी
(25 दिसम्बर, 1891 – 1 अक्टूबर 1979):

गाँव माँसी सैणीसेरा, चौथान पट्टी, गढ़वाल। इतिहास प्रसिद्ध पेशावर काण्ड के नायक, अनन्य देशप्रेमी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, संघर्षशील व्यक्तित्व, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में अंकित नाम। गाँधी जी के शब्दों में-“मुझे एक चंद्र सिंह और मिलता तो भारत कभी का स्वतंत्र हो गया होता।”

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का बाल्यकाल विद्यार्थी जीवन से होकर नहीं गुजरा था। इसका मुख्य कारण पारिवारिक गरीबी था, श्री कुँवर सिंह नेगी ‘कर्मठ’ लिखते है कि चन्द्र सिंह के पिता श्री जाथली सिंह अपने पुत्र की शिक्षा-व्यवस्था करना चाहते थे, परन्तु स्कूल के अभाव में वे ऐसा नहीं कर सके। आर्थिक विपन्नता के कारण वे अपने पुत्र को किसी दूर के स्कूल में भी नहीं भेज सके थे। गाँव के थोकदार जब अपने बच्चों को लिखना-पढ़ना सिखलाते थे, तो ये भी कुछ बातों को सुनकर हृदयगम कर लिया करते थे। फिर कुछ समय तक इन्होंने एक ईसाई अध्यापक से दर्जा 2 तक पढ़ना-लिखना सीख लिया था। कर्मठ जी ने आगे लिखा है कि पढ़ने-लिखने में इनका मन नहीं लगता था। क्योंकि ये बचपन में बहुत नटखट तथा चंचल थे। शरीर से हृष्ट पुष्ट होने के कारण इन्हें ‘भढ़’ कहा जाता था। इस प्रकार इन्होंने अपने सम-वयस्क बालक-बालिकाओं के दल का नेतृत्व संभाल लिया था और उत्पातों से भरपूर अल्हड़ जीवन बिताते रहे।

वीर चन्द्र सिंह ‘गढ़वाली’ के बाल्यकाल की कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें स्मरण करने पर ज्ञात होता है कि वे कितने उन्मुक्त एवं स्वतंत्र प्रकृति के व्यक्ति थे। घर आँगन में बच्चों का खेल हो अथवा ग्वाल-बालों के साथ की उधम चौकड़ी हो। कहा जाता है कि किशोर चन्द्र सिंह हर जगह मुखिया बना रहता था। श्री भक्तदर्शन लिखते हैं कि ‘बचपन में श्री चन्द्र सिंह उत्पातों से भरपूर अल्हड़ जीवन बिताते रहे। गढ़गौरव के सम्पादक श्री कुँवर सिंह नेगी ‘कर्मठ’ लिखते हैं, उन्हीं दिनों एक बार सेरा-सवाई हो रही थी, समस्त ग्रामवासी मिलकर इनके खेतों में धान की रोपाई कर रहे थे। उन सबके लिए इनके घर में अच्छे स्वादिष्ट भोजन तैयार किए गए। इन्होंने एक लड़की से विवाह का स्वांग रचा और अपनी सारी बारात के साथ उस दावत का भोजन जंगल में लगा दिया।

परिणाम यह हुआ कि रोपाई से लौट आने के बाद ग्रामवासियों के लिए दोबारा भोजन पकाना पड़ा। कुछ दिन बाद इसी लड़की से इनकी शादी भी हो गई। यह लड़की इनसे दो वर्ष बड़ी थी।

अंग्रेजों के दुर्व्यवहार को देखकर किशोर चन्द्र सिंह मन ही मन बहुत क्षुब्ध रहता था। परन्तु घर की गरीबी और प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण एक किशोर समय की प्रतीक्षा के लिए मजबूर था। उन दिनों सारे गढ़वाल-कुमाऊँ में ब्रिटिश राज का दौर था, बेगार-बर्दयाश की कुप्रथाएं प्रचलित थी। एक बार एक मुर्गियों का बड़ा टोकरा, चन्द्र सिंह को एक पड़ाव से दूसरे पड़ाव तक पहुँचाना पड़ा था।

चन्द्र सिंह ने बाल्यावस्था में जो विवाह किया था, उनसे उनकी कोई संतान नहीं हुई। इनके पिता ने इनकी दूसरी शादी की। उनसे इनकी एक कन्या हुई। विवाह होने पर उस लड़की का एक लड़का हुआ जो भावर सिमलचौड़ में बसागत है। इन्होंने तीसरा विवाह अल्मोड़ा के ग्राम मैंगणी के एक हवलदार की कन्या से किया। हवलदार जी ने अपनी सारी जमीन-जायजाद इन्हें दान में दे दी। तीसरे विवाह से चन्द्र सिंह की कोई संतान नहीं हुई। इनके पिता श्री जाथली सिंह अपने पुत्र की संतान के प्रति बहुत चिन्तित रहते थे। इस कारण उन्होंने अपने पुत्र श्री चन्द्र सिंह की चौथी शादी सन् 1929 में राउँगांव पट्टी, चौपड़ाकोट, पौड़ी गढ़वाल की एक कन्या से करवा दी। चन्द्र सिंह गढ़वाली की चौथी पत्नी का नाम भागीरथी देवी था, जो विवाह के समय लगभय 12-13 साल की थी। विवाह के समय चन्द्र सिंह एक सैनिक के रूप में पेशावर में थे और घर में घड़े के साथ गणेश पूजन कर उनका विवाह हो गया था। इनकी पहली पत्नी का कुछ समय के पश्चात् निधन हो गया था। साथ ही इनके 10-11 साल के जेल जीवन के समय दो पत्नियां घर छोड़कर अपने मायके चली गई थी। चौथी पत्नी श्रीमती भागीरथी देवी जिन्होंने अपने पति के मुख दर्शन भी नहीं किये थे, वे अत्यन्त पति परायणा थी तथा अपने पति के नाम पर ससुराल में ही रहने लगी। इनसे गढ़वाली जी के चार बच्चे हुए – माधुरी और क्रांतिज्वाला दो कन्याएँ तथा आनन्द चन्द्र गढ़वाली तथा खुशहाल चन्द्र गढ़वाली दो पुत्र। श्रीमती भागीरथी देवी का जीवन भी बड़े संकटों से होकर गुजरा था। गढ़वाली जी के जेल से छूटने के बाद श्रीमती भागीरथी देवी कई वर्षों तक उनके साथ काण्डई गाँव. पौड़ी में भूखी-प्यासी रही।

सेना में भर्ती चन्द्र सिंह गढ़वाली जी जिस समय 22 वर्ष के थे, उस समय प्रथम विश्व युद्ध छिड़ गया था। बड़े पैमाने पर सेना में भर्ती होने लगी थी। भक्तदर्शन ने अपनी पुस्तक ‘गढ़वाल की दिवंगत विभूतियों’ में लिखा है कि ‘एक भर्ती करने वाला गढ़वाली हवलदार इनके गाँव पहुँच गया। इन्हें सेना में भर्ती होने का एक सुनहरा अवसर दिखाई दिया। ये भागकर उस भर्ती करने वाले हवलदार के पीछे-पीछे हो लिए और उसके साथ ढाईज्यूली तथा पौड़ी के रास्ते लैंसडौन छावनी पहुँच गए। 11 सितम्बर, 1914 को इन्हें लैंसडौन स्थित गढ़वाली फौज में भर्ती कर लिया गया और 2/39 गढ़वाली राइफल्स की छटी कम्पनी की बारहवीं सेक्शन में रख लिया गया। हट्टे-कट्टे जवान होने से इन्होंने फौजी ट्रेनिंग में शीघ्र ही सफलता हासिल कर ली और नौ महीने बाद कसम खाकर पूरे सिपाही बन गए। कुँवर सिंह नेगी ‘कर्मठ’ लिखते हैं- ‘ये दिन भर सैनिकों के साथ कुछ न कुछ बोलते रहते थे। इसलिए इनके साथी सैनिक इन्हें व्यंग में ‘चन्द्रीभाट’ कहा करते थे।’

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अगस्त, 1915 में मित्र राष्ट्रों की ओर से अपने सैनिक साथियों के साथ योरोप और मध्य-पूर्वी क्षेत्र में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी निभाई। अक्टूबर में स्वदेश लौटे। पुनः 1917 में अंग्रेजों की ओर से मोसापोटामिया युद्ध में भाग लिया। 1921-23 की अवधि में पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत में रहे जहाँ अंग्रेजों और पठानों के मध्य युद्ध हो गया था। 1920 के बाद चन्द्र सिंह देश में घटित राजनैतिक घटनाओं में रुचि लेने लगे। 1929 में गाँधी जी कुमाँऊ भ्रमण पर आए। चन्द्र सिंह उन दिनों छुट्टी पर

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