03 Jul 2025
उत्तराखण्ड की महान विभूति नन्तराम ‘नतियाराम’ नेगी जी !
वीरों की भूमि उत्तराखण्ड का इतिहास महान योद्धाओं की वीरगाथा और उनके बलिदानों से भरा हुआ है। इनमें से एक, मुगल सेना को धूल चटाने वाले पराक्रमी योद्धा नंत राम नेगी जी हैं। देशभक्त, राजभक्त, अदम्य साहसी वीर योद्धा नन्तराम नेगी जी का जन्म सन् 1725 को बेराट खाई जौनसार परगना देहरादून में हुआ। देहरादून के सुदूर-पश्चिम में स्थित जौनसार- भाभर एक जनजातीय क्षेत्र है।
‘गुलदार’ की उपाधि से सम्मानित नंत राम नेगी जी को ‘नतिया’ नेगी भी कहते हैं। आज भी लोग आपकी वीरगाथा की गूंज हर तीज त्यौहार में हारुल के रूप में तमसा यमुना घाटी के आर-पार के गांवों में बिखेरते रहते हैं।
रोहिला सरदार गुलाम कादिर खान मध्य हरिद्वार में खून की नदियाँ बहाता हुआ देहरादून पंहुचा। उसने देहरादून को तहस नहस करके गुरुद्वारा गुरु राम राय में गोऊ हत्या कर के गुरूद्वारे में आग लगा दी। देहरादून से वो नाहन सिरमौर, हिमांचल प्रदेश की ओर बड़ा और पौंटा साहिब में डेरा डाल दिया।
राजा प्रताप प्रकाश जी लम्बी बीमारी में जिंदगी की अंतिम सांसें गिन रहे थे और राजा जगत प्रकाश जी सिरमौर में सिंहासन रूढ़ हुए थे, जोकि नाबालिक थे। इसलिए राज-काज उनकी माता देखती थी। नाहन के राजा उस बड़ी फौज को देखकर घबरा गए। उन्होंने घोषणा करवाई कि इस कठिन परिस्थिति में नाहन राज्य को कौन बचा सकता है? राज-दरबारियों ने राजमाता को सलाह दी कि वीर नन्तराम नेगी इस कार्य के लिए आगे आ सकता है।
नाहन के राजा ने तत्काल अपने सेनापति को बेराट खाई भेजा। दुर्गम पर्वतीय मार्ग से होता हुआ वह सेनापति नन्तराम के गढ़ बेराट खाई पहुँचा। राजा का सन्देश पाकर नवयुवक नन्तराम तुरन्त तैयार होकर नाहन की ओर चल दिया। राजा इस सुगठित नौजवान को देखकर प्रसन्न हुआ। उसने नन्तराम की परीक्षा लेने के लिए दरबार में एक भारी-भरकम तलवार मंगाई आर दरबार के बीच रखकर उसे उठाने का आदेश दिया। नन्तराम तलवार की ओर बढ़ा और उसने तुलवार को उठाकर बहुत सरलता से हवा में घुमा दिया। उसके इस सामर्थ्य को देखकर सारा दरबार नन्तराम की जय-जयकार से गूंज उठा।
तत्पश्चात एक सैनिक टुकड़ी की बागडोर नन्तराम जी को सौंपी गई। उसको लेकर नन्तराम जी यमुना के तट पर पहुंचे, जहां मुगल सेना पड़ाव डाले हए थी। मुस्लिम सिपहसालार शक्ति के नशे में चूर थे। नन्तराम जी ने पहुंचते ही पर्वतीय सैनिकों के साथ आक्रमण प्रारम्भ कर दिया। हक्के-बक्के मुगल संभल भी न पाये थे कि स्वयं नन्तराम जी बहादुरी से आगे बढ़े और मुगल सेनापति के तम्बू में घुसकर मुगल सेनापति सरदार कादिर खान रोहिल्ला का सिर धड़ से अलग कर दिया।
सेनापति विहीन फौज भाग खड़ी हुई और अनेक सैनिक यमुना के तज बहाव में बह गये। मुगल सैनिको ने नती राम नेगी जी के साथ कोलर तक लड़ाई लड़ी, जिस कारण नती राम नेगी जी व उनका घोड़ा बुरी तरह से घायल हो कर वापिसी में मार्कण्डे डांडा की चढाई में 14 फरवरी सन 1746 को वीरगती को प्राप्त हुए।
मुगल आक्रांताओं से हुए इस युद्ध के समय नन्तराम नेगी जी की आयु मात्र इक्कीस (21) वर्ष थी, वीर योद्धा और उनकी माटी को सादर प्रणाम !












