30 Oct 2025
पुस्तक का नाम:
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
“संघ यात्रा”
संगठन और सेवा के 100 वर्ष
प्रस्तावना : आदरणीय दत्तात्रेय होसबोले (सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ)
प्रकाशन: विश्व संवाद केंद्र, देहरादून
उपलब्धता: विश्व संवाद केंद्र, देहरादून — मूल्य ₹25 मात्र
भूमिका और उद्देश्य
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी यात्रा के अवसर पर प्रकाशित यह पुस्तक संघ के सौ वर्षों की वैचारिक, संगठनात्मक और सामाजिक यात्रा का संक्षिप्त परंतु गहन चित्र प्रस्तुत करती है। पुस्तक का उद्देश्य केवल संघ की गतिविधियों का विवरण देना नहीं, बल्कि संघ की दृष्टि, कार्यपद्धति और राष्ट्रनिर्माण की मूल अवधारणा को समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुँचाना है।
संघ की संकल्पना और दृष्टि
इस पुस्तक में संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. हेडगेवार जी की उस मूल संकल्पना को स्पष्ट किया गया है, जिसके आधार पर संगठन का निर्माण हुआ—“व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण।” संघ की दृष्टि केवल संगठन खड़ा करने की नहीं, बल्कि एक एकात्म और सशक्त समाज के निर्माण की रही है।
शाखाओं, मिलन मंडलियों और विविध सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से यह कार्य भारत ही नहीं, विश्वभर में विस्तार पा रहा है।
विचार, धर्म और राष्ट्र की अवधारणा
लेखक ने स्पष्ट किया है कि संघ की दृष्टि में राष्ट्र केवल राजनीतिक सीमा से परिभाषित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना से निर्मित है। भारत के राष्ट्रत्व का आधार धर्म है — जो किसी पंथ या संप्रदाय का नाम नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सत्य, कर्तव्य और समरसता का आचरण है।
धर्म की यह व्यापक संकल्पना भारतीय संस्कृति की आत्मा है और यही संघ के चिंतन की जड़ है।
समाज परिवर्तन और सेवा कार्य
पुस्तक में संघ और उसके अनुशांगिक संगठनों द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्राम विकास, पर्यावरण, स्वदेशी उद्योग, तथा सामाजिक समरसता के क्षेत्र में किए गए सेवा कार्यों का विस्तृत उल्लेख है।
पंच परिवर्तन—
1. सामाजिक समरसता
2. पर्यावरण संरक्षण
3. कुटुंब प्रबोधन
4. स्वदेशी जीवनशैल
5. नागरिक कर्तव्य का बोध
ये पाँच परिवर्तन संघ की शताब्दी यात्रा के मूल स्तंभ हैं, जो भारत के नव निर्माण का आधार बनते हैं।
भारत की चुनौतियाँ और समाधान
पुस्तक में यह भी वर्णन है कि भारत की वर्तमान परिस्थितियों में कौन-कौन सी आंतरिक और बाहरी चुनौतियाँ राष्ट्र की एकता पर खतरा बन रही हैं — धर्मांतरण, सांस्कृतिक विघटन, पर्यावरण असंतुलन, जनसंख्या असंतुलन, और विदेशी विचारधाराओं का अंधानुकरण।
इनका समाधान संघ आत्मविश्वास, स्वभाषा, स्वदेशी और स्वसंस्कृति में देखता है। लेखक का मत है कि भारत की उन्नति अपने ही मूल में, अपनी जड़ों में निहित है।
महिलाओं और भारतीय दृष्टिकोण
पुस्तक में भारतीय समाज में महिलाओं की भूमिका का भी विशद उल्लेख है। भारतीय दृष्टि में स्त्री का स्थान सदैव सम्मान, सहयोग और समानता का रहा है। भारतीय विदुषियों ने विज्ञान, शिक्षा, साहित्य, उद्योग और शासन के प्रत्येक क्षेत्र में अपना अमूल्य योगदान दिया है। यह दृष्टिकोण भारत की संस्कृति की विशिष्टता है।
संघ की समग्र दृष्टि
संघ की दृष्टि में भारत केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता से ओतप्रोत एक जीवंत राष्ट्र है। विविध जातियाँ, भाषाएँ, परंपराएँ और आचार — सब इस एक ही माता की संतान हैं। इस एकता का भाव ही हिंदुत्व का सार है।
समीक्षा
यह पुस्तक आकार में भले ही छोटी हो, परंतु विषयवस्तु में अत्यंत गंभीर और व्यापक है। इसमें संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर आत्ममंथन, समाज-मनन और भावी दिशा तीनों का संतुलित समन्वय मिलता है।
पुस्तक की शैली सरल, प्रेरणादायक और बोधगम्य है। पुस्तक संघ के स्वयंसेवकों के लिए मार्गदर्शक होने के साथ-साथ उन सभी के लिए भी उपयोगी है जो भारत की सांस्कृतिक एकता, समाज निर्माण और राष्ट्र की मूल आत्मा को समझना चाहते हैं।
निष्कर्ष
यह पुस्तक केवल संघ के 100 वर्षों की गाथा नहीं, बल्कि भारत के पुनर्जागरण की दिशा में एक वैचारिक दस्तावेज है।
प्रत्येक राष्ट्रप्रेमी, समाजसेवी और भारत की संस्कृति को समझने के इच्छुक पाठक को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए।












