ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः | सर्वे भद्रान्नि पश्यन्तु, माँ कश्चिद्-दुःख-भाग-भवेत् ||     ॐ शांतिः शांतिः शांतिः                                                                   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष (विक्रम संवत 1982–2082)                                                                  
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धर्मध्वजा : सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक

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धर्मध्वजा : सभ्यता के पुनर्जागरण का प्रतीक
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29 Nov 2025

आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष बिंदु की साक्षी बन रही है। आज संपूर्ण भारत, संपूर्ण विश्व राममय है। हर रामभक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष, असीम कृतज्ञता और अपार अलौकिक आनंद है। सदियों के घाव भर रहे हैं। सदियों की वेदना आज विराम पा रही है। सदियों का संकल्प आज सिद्धि को प्राप्त हो रहा है। आज उस यज्ञ की पूर्णाहुति है, जिसकी अग्नि 500 वर्षतक प्रज्वलित रही। जो यज्ञ एक पल भी आस्था से डिगा नहीं, एक पल भी विश्वास से टूटा नहीं। आज भगवान श्री राम के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा, श्री राम परिवार का दिव्य प्रताप इस धर्म ध्वजा के रूप में इस दिव्यतम, भव्यतम मंदिर में प्रतिस्थापित हुआ है।

पुनर्जागरण का ध्वज

यह धर्म ध्वजा केवल एक ध्वजा नहीं, भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का ध्वज है। इसका भगवा रंग, इस पर रचित सूर्यवंश की ख्याति, ऊं और कोविदार वृक्ष रामराज्य की कीर्ति को प्रतिरूपित करता है। यह ध्वज संकल्प, सफलता और ध्वज संघर्ष से सृजन की गाथा है। यह ध्वज सदियों से चले आ रहे स्वप्नों का साकार स्वरूप है। यह संतों की साधना और समाज की सहभागिता की सार्थक परिणीति है। आने वाली सदियों और सहस्र-शताब्दियों तक यह धर्मध्वज प्रभु राम के आदर्शों और सिद्धांतों का उद्घोष करेगा। यह धर्मध्वज आह्वान करेगा-‘सत्यमेव जयते नानृतं’ यानी जीत सत्य की ही होती है, असत्य की नहीं।

यह धर्मध्वज उद्घोष करेगा-‘सत्यम्-एकपदं ब्रह्म सत्ये धर्मः प्रतिष्ठितः’ अर्थात् सत्य ही ब्रह्म का स्वरूप है, सत्य में ही धर्म स्थापित है। यह धर्मध्वज प्रेरणा बनेगा-प्राण जाए पर वचन न जाए। अर्थात्, जो कहा जाए, वही किया जाए। यह धर्मध्वज संदेश देगा-कर्म प्रधान विश्व रचि राखा! अर्थात्, विश्व में कर्म और कर्तव्य की प्रधानता हो। यह धर्मध्वज कामना करेगा-बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा॥ यानी, भेदभाव, पीड़ा-परेशानी से मुक्ति, समाज में शांति और सुख हो। यह धर्मध्वज हमें संकल्पित करेगा-नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। यानी, हम ऐसा समाज बनाएं, जहां गरीबी न हो, कोई दुखी या लाचार न हो।

हमारे ग्रंथों में कहा गया है-
आरोपितं ध्वजं दृष्ट्वा, ये अभिनन्दन्ति धार्मिकाः।
ते अपि सर्वे प्रमुच्यन्ते, महा पातक कोटिभिः॥
यानी, जो लोग किसी कारण मंदिर नहीं आ पाते और दूर से मंदिर के ध्वज को प्रणाम कर लेते हैं, उन्हें भी उतना ही पुण्य मिल जाता है।

मंदिर के ध्येय का प्रतीक

यह धर्मध्वज भी इस मंदिर के ध्येय का प्रतीक है, जो दूर से ही रामलला की जन्मभूमि के दर्शन कराएगा और युगों-युगों तक प्रभु श्रीराम के आदेशों और प्रेरणाओं को मानव मात्र तक पहुंचाएगा। मैं संपूर्ण विश्व के करोड़ों रामभक्तों को इस अविस्मरणीय क्षण, इस अद्वितीय अवसर की हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं। उन सभी भक्तों को प्रणाम करता हूं, हर उस दानवीर का भी आभार व्यक्त करता हूं, जिसने राम मंदिर निर्माण के लिए अपना सहयोग दिया। राम मंदिर के निर्माण से जुड़े हर श्रमवीर, हर कारीगर, हर योजनाकार, हर वास्तुकार, सभी का अभिनंदन करता हूं। अयोध्या वह भूमि है, जहां आदर्श, आचरण में बदलते हैं। यहीं से श्रीराम ने अपना जीवन-पथ शुरू किया था। इसी अयोध्या ने संसार को बताया कि एक व्यक्ति कैसे समाज की शक्ति, उसके संस्कारों से पुरुषोत्तम बनता है। जब श्रीराम अयोध्या से वनवास गए, तो युवराज राम थे, लेकिन जब लौटे, तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे। उनके मर्यादा पुरुषोत्तम बनने में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषादराज की मित्रता, मां शबरी की ममता, भक्त हनुमान का समर्पण, इन सबकी, अनगिनत ऐसे लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

विकसित भारत बनाने के लिए भी समाज की इसी सामूहिक शक्ति की आवश्यकता है। मुझे बहुत खुशी है कि राम मंदिर का यह दिव्य प्रांगण, भारत के सामूहिक सामर्थ्य की भी चेतना स्थली बन रहा है। यहां सप्तमंदिर, माता शबरी का मंदिर बना है, जो जनजातीय समाज के प्रेमभाव और आतिथ्य परंपरा की प्रतिमूर्ति हैं।

निषादराज का मंदिर उस मित्रता का साक्षी है, जो साधन नहीं, साध्य और उसकी भावना को पूजती है। यहां एक ही स्थान पर माता अहिल्या, महर्षि वाल्मीकी, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य और संत तुलसीदास हैं। रामलला के साथ-साथ इन सभी
ऋ षियों के दर्शन भी यहीं पर होते हैं। यहां जटायु जी और गिलहरी की मूर्तियां भी हैं, जो बड़े संकल्पों की सिद्धि के लिए हर छोटे से छोटे प्रयास के महत्व को दिखाती हैं।

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संकल्प सिद्धि का समय

हम सब जानते हैं, हमारे राम भेद से नहीं, भाव से जुड़ते हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं, उसकी भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें वंश नहीं, मूल्य प्रिय हैं। उन्हें शक्ति नहीं, सहयोग महान लगता है। आज हम भी उसी भावना से आगे बढ़ रहे हैं। पिछले 11 वर्ष में महिला, दलित, पिछड़े, अति-पिछड़े, आदिवासी, वंचित, किसान, श्रमिक, युवा, हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा गया है। जब देश का हर व्यक्ति, हर वर्ग, हर क्षेत्र सशक्त होगा, तब संकल्प की सिद्धि में सबका प्रयास लगेगा। सबके प्रयास से ही 2047 में जब देश आजादी के 100 साल मनाएगा, हमें 2047 तक विकसित भारत का निर्माण करना ही होगा।

रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के ऐतिहासिक अवसर पर मैंने राम से राष्ट्र के संकल्प की चर्चा की थी। यह कहा था कि हमें आने वाले एक हजार वर्षों के लिए भारत की नींव मजबूत करनी है। हमें वर्तमान के साथ-साथ भावी पीढ़ियों के बारे में भी सोचना है, क्योंकि हम जब नहीं थे, यह देश तब भी था। जब हम नहीं रहेंगे, यह देश तब भी रहेगा। हम एक जीवंत समाज हैं, हमें दूरदृष्टि के साथ ही काम करना होगा। हमें आने वाले दशकों, आने वाली सदियों को ध्यान में रखना ही होगा।

राम यानी…

इसके लिए भी हमें प्रभु राम से सीखना होगा। हमें उनके व्यक्तित्व को समझना होगा। उनके व्यवहार को आत्मसात करना होगा। हमें याद रखना होगा, राम यानी-आदर्श, मर्यादा, जीवन का सर्वोच्च चरित्र, सत्य और पराक्रम का संगम, धर्मपथ पर चलने वाला व्यक्तित्व, जनता के सुख को सर्वोपरि रखना, धैर्य और क्षमा का दरिया, ज्ञान और विवेक की पराकाष्ठा, कोमलता में दृढ़ता, कृतज्ञता का सर्वोच्च उदाहरण, श्रेष्ठ संगति का चयन, विनम्रता में महाबल, सत्य का अडिग संकल्प, जागरूक, अनुशासित और निष्कपट मन।
राम सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, राम एक मूल्य, मर्यादा, दिशा हैं। अगर भारत को साल 2047 तक विकसित बनाना है, अगर समाज को सामर्थ्यवान बनाना है, तो हमें अपने भीतर ‘राम’ को जगाना होगा। हमें अपने भीतर के राम की प्राण प्रतिष्ठा करनी होगी और इस संकल्प के लिए आज से बेहतर दिन और क्या हो सकता है?

25 नवंबर का यह ऐतिहासिक दिन अपनी विरासत पर गर्व का एक और अद्भुत क्षण लेकर आया है। इसकी वजह है, धर्मधव्ज पर अंकित- कोविदार वृक्ष। यह वृक्ष इस बात का उदाहरण है कि जब हम अपनी जड़ों से कट जाते हैं, तो हमारा वैभव इतिहास के पन्नों में दब जाता है। जब भरत अपनी सेना के साथ चित्रकूट पहुंचे, तो लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया। आज जब राम मंदिर के प्रांगण में कोविदार फिर से प्रतिष्ठित हो रहा है, यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं है, यह हमारी स्मृति की वापसी है। हमारी अस्मिता का पुनर्जागरण है। हमारी स्वाभिमानी सभ्यता का पुनः उद्घोष है। कोविदार वृक्ष याद दिलाता है कि जब हम अपनी पहचान भूलते हैं, तो हम स्वयं को खो देते हैं। और जब पहचान लौटती है, तो राष्ट्र का आत्मविश्वास भी लौट आता है। इसलिए कहता हूं, देश को आगे बढ़ना है, तो अपनी विरासत पर गर्व करना होगा।

गुलामी की मानसिकता से मुक्ति का आह्वान

अपनी विरासत पर गर्व के साथ-साथ एक और बात भी महत्वपूर्ण है और वह है-गुलामी की मानसिकता से पूरी तरह मुक्ति। 190 साल पहले 1835 में मैकाले नाम के एक अंग्रेज ने भारत को अपनी जड़ों से उखाड़ने के बीज बोए थे। मैकाले ने भारत में मानसिक गुलामी की नींव रखी थी। दस साल बाद यानी 2035 में उस अपवित्र घटना के 200 वर्ष पूरे हो रहे हैं। कुछ दिन पहले ही मैंने एक कार्यक्रम में आग्रह किया था कि हमें आने वाले दस वर्ष का लक्ष्य लेकर चलना है कि भारत को गुलामी की मानसिकता से मुक्त करके रहेंगे।

सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि मैकाले ने जो सोचा था, उसका प्रभाव कहीं व्यापक हुआ। हमें आजादी मिली, लेकिन हीन भावना से मुक्ति नहीं मिली। हमारे यहां एक विकार आ गया कि विदेश की हर चीज, हर व्यवस्था अच्छी है और जो हमारी अपनी चीजें हैं, उनमें खोट ही खोट है। गुलामी की यही मानसिकता है, जिसने लगातार यह स्थापित किया कि हमने विदेशों से लोकतंत्र लिया, हमारा संविधान भी विदेश से प्रेरित है, जबकि सच यह है कि भारत लोकतंत्र की जननी है। लोकतंत्र हमारे डीएनए में है।

अगर आप तमिलनाडु जाएंगे, तो राज्य के उत्तरी हिस्से में उत्तिरमेरूर गांव है। वहां हजारों वर्ष पहले का एक शिलालेख है। उसमें बताया गया है कि उस कालखंड में भी कैसे लोकतांत्रिक तरीके से शासन व्यवस्था चलती थी, लोग कैसे सरकार चुनते थे। लेकिन हमारे यहां तो मैग्नाकार्टा की प्रशंसा का ही चलन रहा। हमारे यहां भगवान बसवन्ना, उनके ‘अनुभव मंतप (मंडप)’ की जानकारी भी सीमित रखी गई। अनुभव मंडप, यानी जहां सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक विषयों पर सार्वजनिक बहस होती थी, सामूहिक सहमति से निर्णय लिए जाते थे। लेकिन गुलामी की मानसिकता के कारण भारत की कितनी ही पीढ़ियों को इस जानकारी से भी वंचित रखा गया।

हमारी व्यवस्था के हर कोने में गुलामी की इस मानसिकता ने डेरा डाला हुआ था। आप याद करिए, भारतीय नौसेना का ध्वज। सदियों तक उस ध्वज पर ऐसे प्रतीक बने रहे, जिनका हमारी सभ्यता, हमारी शक्ति, हमारी विरासत से कोई संबंध नहीं था। अब हमने नौसेना के ध्वज से गुलामी के हर प्रतीक को हटाया है। हमने छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत को स्थापित किया है। यह सिर्फ एक डिजाइन में बदलाव नहीं, मानसिकता बदलने का क्षण था। यह वह घोषणा थी कि भारत अब अपनी शक्ति, अपने प्रतीकों से परिभाषित करेगा, न कि किसी और की विरासत से। यही परिवर्तन आज अयोध्या में भी दिख रहा है। यह गुलामी की मानसिकता ही है, जिसने इतने वर्षों तक रामत्व को नकारा है। भगवान राम अपने आप में एक वैल्यू सिस्टम हैं। ओरछा के राजा राम से लेकर रामेश्वरम् के भक्त राम तक और शबरी के प्रभु राम से लेकर मिथिला के पाहुन राम जी तक, भारत के हर घर में, हर भारतीय के मन और भारतवर्ष के हर कण-कण में राम हैं। लेकिन गुलामी की मानसिकता इतनी हावी हो गई कि प्रभु राम को भी काल्पनिक घोषित किया जाने लगा।

अगर हम ठान लें, तो अगले दस साल में मानसिक गुलामी से पूरी तरह मुक्ति पा लेंगे, तब जाकर ऐसी ज्वाला प्रज्ज्वलित होगी, ऐसा आत्मविश्वास बढ़ेगा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना पूरा होने से भारत को कोई रोक नहीं पाएगा। आने वाले एक हजार वर्ष के लिए भारत की नींव तभी सशक्त होगी, जब मैकाले के गुलामी के प्रोजेक्ट को हम अगले 10 साल में पूरी तरह ध्वस्त करके दिखा देंगे।

ध्वजारोहण के अवसर पर श्रीराम मंदिर प्रांगण में उपस्थित गणमान्यजन

भव्यतम अयोध्या धाम

अयोध्या धाम में रामलला का मंदिर परिसर भव्य से भव्यतम हो रहा है और साथ ही अयोध्या को संवारने का काम लगातार जारी है। अयोध्या फिर से दुनिया के लिए उदाहरण बनेगी। त्रेता युग की अयोध्या ने मानवता को नीति दी, 21वीं सदी की अयोध्या मानवता को विकास का नया मॉडल दे रही है। तब अयोध्या मर्यादा का केंद्र थी, अब अयोध्या विकसित भारत का मेरुदंड बनकर उभर रही है।
भविष्य की अयोध्या में पौराणिकता और नूतनता का संगम होगा। सरयू जी की अमृत धारा और विकास की धारा, एक साथ बहेंगी। यहां अध्यात्म और आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, दोनों का तालमेल दिखेगा। राम पथ, भक्ति पथ और जन्मभूमि पथ से नई अयोध्या के दर्शन होते हैं। अयोध्या में भव्य हवाईअड्डा है, अयोध्या में आज शानदार रेलवे स्टेशन है। वंदे भारत और अमृत भारत एक्सप्रेस जैसी ट्रेनें अयोध्या को बाकी देश से जोड़ रही हैं। अयोध्या वासियों को सुविधाएं मिलें, उनके जीवन में समृद्धि आए, इसके लिए निरंतर काम चल रहा है।
जब से प्राण प्रतिष्ठा हुई है, तब से लेकर आज तक करीब 45 करोड़ श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए आ चुके हैं। इससे अयोध्या और आसपास के लोगों की आय में आर्थिक परिवर्तन आया है, वृद्धि हुई है। कभी अयोध्या विकास के पैमानों में बहुत पीछे थी, आज अयोध्या नगरी उत्तर प्रदेश के अग्रणी शहरों में से एक बन रही है।

21वीं सदी का आने वाला समय बहुत महत्वपूर्ण है। आजादी के बाद के 70 साल में भारत विश्व की 11वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना, लेकिन पिछले 11 साल में ही भारत विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है। वह दिन दूर नहीं, जब भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन जाएगा। आने वाला समय नए अवसरों का है, नई संभावनाओं का है। और इस अहम कालखंड में भी भगवान राम के विचार ही हमारी प्रेरणा बनेंगे। जब श्रीराम के सामने रावण विजय जैसा विशाल लक्ष्य था, तब उन्होंने कहा था-
सौरज धीरज तेहि रथ चाका।
सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।।
बल बिबेक दम परहित घोरे।
छमा कृपा समता रजु जोरे।।
यानी, रावण पर विजय पाने के लिए जो रथ चाहिए, शौर्य और धैर्य उसके पहिए हैं। उसकी ध्वजा सत्य और अच्छे आचरण की है। बल, विवेक, संयम और परोपकार इस रथ के घोड़े हैं। लगाम के रूप में क्षमा, दया और समता हैं, जो रथ को सही दिशा में रखते हैं।
विकसित भारत की यात्रा को गति देने के लिए ऐसा ही रथ चाहिए, ऐसा रथ जिसके पहिए शौर्य और धैर्य हों। यानी चुनौतियों से टकराने का साहस भी हो और परिणाम आने तक दृढ़ता से डटे रहने का धैर्य भी हो। ऐसा रथ, जिसकी ध्वजा सत्य और सर्वोच्च आचरण हो, यानी नीति, नीयत और नैतिकता से समझौता कभी न हो। ऐसा रथ, जिसके घोड़े बल, विवेक, संयम और परोपकार हों, यानी शक्ति भी हो, बुद्धि भी हो, अनुशासन भी हो और दूसरों के हित का भाव भी हो। ऐसा रथ, जिसकी लगाम क्षमा, करुणा और समभाव हो, यानी जहां सफलता का अहंकार नहीं और असफलता में भी दूसरों के प्रति सम्मान बना रहे। इसलिए मैं आदरपूर्वक कहता हूं, यह पल कंधे से कंधा मिलाने का है।

यह पल गति बढ़ाने का है। हमें वह भारत बनाना है, जो रामराज्य से प्रेरित हो। और यह तभी संभव है, जब स्वयंहित से पहले, देशहित होगा। जब राष्ट्रहित सर्वोपरि रहेगा। एक बार फिर आप सभी को बहुत-बहुत शुभकामनाएं देता हूं।
जय सियाराम

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