ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः | सर्वे भद्रान्नि पश्यन्तु, माँ कश्चिद्-दुःख-भाग-भवेत् ||     ॐ शांतिः शांतिः शांतिः                                                                   राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ शताब्दी वर्ष (विक्रम संवत 1982–2082)                                                                  
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कर्मयोगी डॉ. नित्यानंद जी

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कर्मयोगी डॉ. नित्यानंद जी
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03 Jul 2025

कर्मयोगी डॉ. नित्यानंद जी का संक्षिप्त जीवन परिचय
(20 फरवरी 1926 – 8 जनवरी 2016)

जीवन पर्यन्त, पहाड़ियों के जीवन की कठिनाईयों एवं पहाड़ की पीड़ा को सच्चे मन से समझने और समस्याओं को दूर करने की लड़ाई लड़ने वाले विश्व प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता, उत्कृष्ट समाजसेवी, प्रख्यात शिक्षाविद, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जीवनव्रती कार्यकर्ता, कर्मयोगी प्रोफेसर डॉ.नित्यानंद जी सही मायने में हिमालय पुत्र थे। आपने आजीवन सच्चे स्वयंसेवक का कर्तव्य निभाते हुए भावी पीढ़ी के लिए आदर्श प्रस्तुत किया। आपके अथक प्रयासों एवं कार्यों से उत्तराखण्ड का गठन संभव हो सका। सही अर्थों में कहें तो डॉ. नित्यानंद जी उत्तराखण्ड राज्य के प्रणेता और हिमालय के सच्चे सेवक थे।

हिमालय, सभी पर्यटकों तथा अध्यात्म प्रेमियों को हमेशा अपनी ओर आकर्षित करता है। हिमालय के सौन्दर्य से अभिभूत हो लाखों लोग इधर आते रहे होंगे लेकिन 20 फरवरी सन् 1926 को आगरा, उत्तर प्रदेश में जन्मे डॉ. नित्यानंद ने ही हिमालय को सेवा कार्य के लिए अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया और अपना पूरा जीवन हिमालय की सेवा में समर्पित कर दिया। आगरा में 1940 में विभाग प्रचारक नरहरि नारायण ने उन्हें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़ा, पर दीनदयाल उपाध्याय से हुई भेंट ने उनका जीवन बदल दिया और उन्होंने संघ के माध्यम से समाज सेवा करने का व्रत ले लिया।

विभिन्न महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य करते हुये वर्ष 1965 में देहरादून डी.बी.एस. कॉलेज में भूगोल के विभागाध्यक्ष के नाते आएऔर सेवानिवृत्ति तक यहीं रहे। आपका सम्पूर्ण जीवन त्याग, समर्पण व सेवा की अनूठी मिसाल है। सेवानिवृत्ति के पश्चात संपूर्ण समय रचनात्मक सेवा कार्यों में लगा दिया तथा उत्तराखंड के सुदूर पिछड़े क्षेत्रों को अपना विशेष कार्यक्षेत्र बनाया। नित्यानंद जी ने एक साधक की तरह मन, वचन और कर्म से समाज की सेवा की और अवकाश प्राप्ति के बाद वे कुछ समय के लिए संघ की योजना से आगरा गए परंतु वहां उनका मन नहीं लगा और फिर वे देहरादून आ गए।

20 अक्तूबर, सन् 1991 दशहरे के दिन हिमालय में विनाशकारी भूकम्प आया। इसमें सर्वाधिक हानि उत्तरकाशी में हुई। डॉ. नित्यानन्द जी ने संघ की योजना से वहां हुए पुनर्निमाण कार्य का नेतृत्व किया। उत्तरकाशी से गंगोत्री मार्ग पर मनेरी गाँव में ‘सेवा आश्रम’ के नाम से इसका केन्द्र बनाया गया। वहाँ 400 से अधिक परिवारों के लिए भूकंप रोधी घर बनवाए और शिक्षा, संस्कार और रोजगार के प्रसार के लिए काम करते रहे। अपनी माता जी के नाम से बने न्यास में वह स्वयं तथा उनके परिजन सहयोग करते थे। डॉ. नित्यानंद जी को ‘उत्तरांचल दैवीय आपदा पीड़ित सहायता समिति’ के गठन का श्रेय जाता है। जो सतत, देश की किसी भी हिस्से में आई आपदा में पीड़ितों की मदद का हरसंभव प्रयास करती हैं। उत्तराखण्ड को अपनी कर्मभूमि बनाकर देश-समाज के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने वाले डॉ. नित्यानंद जी ने दूरस्थ क्षेत्रों के निर्धन विद्यार्थियों, कमजोर बच्चों के उज्ज्वल भविष्य के लिए गंगा घाटी के मनेरी के बाद उत्तरकाशी जिले के लक्षेश्वर में, देहरादून जिले के मागटी पोखरी में,अल्मोड़ा जिले के पटिया में छात्रावास स्थापित किए। यहां से अध्ययन करके अनेक छात्र अब सफलता की ओर अग्रसर हैं।

हिमाचल की तरह इस क्षेत्र को ‘उत्तरांचल’ नाम भी आपने ही दिया, जिसे गठबंधन की मजबूरियों के कारण बीजेपी शासन ने ही ‘उत्तराखण्ड’ कर दिया। केन्द्र में अटल जी की सरकार बनने पर अलग राज्य बना। पर उन्होंने स्वयं को सेवा कार्य तक ही सीमित रखा। उत्तरकाशी की गंगा घाटी पहले ‘लाल घाटी’ कहलाती थी। पर अब वह ‘भगवा घाटी’ कहलाने लगी है। उत्तरकाशी जिले की दूरस्थ तमसा (टाँस) घाटी में भी उन्होंने एक छात्रावास खोला। प्रदेश की कई संस्थाओं ने सेवा कार्यों के लिए उन्हें सम्मानित किया। उन्होंने इतिहास और भूगोल से सम्बन्धित कई पुस्तकें लिखीं। वृद्धावस्था में भी वे ‘सेवा आश्रम मनेरी’ में छात्रों के बीच या फिर देहरादून के संघ कार्यालय पर ही रहते थे।

डॉ. नित्यानंद जी के नाम तथा उनके द्वारा देश समाज हित में किये के कार्यों से सभी परिचित हैं। डॉ. नित्यानंद जी ने एक अध्येता तथा समाजसेवी के रूप में उत्तरांचल के सुदूरवर्ती क्षेत्रों का अनेक बार प्रवास किया तथा युवाओं को विकास की दिशा दी। अपने हमेशा सहयोगियों व छात्रों को समाज सेवा, शोध कार्य व चरित्र निर्माण पर जोर देते हुए प्रोत्साहित किया। हिमालय के प्रति अगाध श्रद्धा एवं अनुराग होने के कारण हिमालय के अनेक रहस्यों, भौगोलिक तथ्यों व हिमालय के बहुआयामी परिवेश को अपने अध्ययन का विषय व कार्य क्षेत्र बनाया तथा विश्व का ध्यान हिमालय की ओर आकर्षित किया। समाज की भलाई के लिए अपनी देह गला कर उत्तराखंड की घाटियों में सेवा का मार्ग प्रशस्त करने वाले आधुनिक युग के दधीचि, आधुनिक संत, हिमालय पुत्र कहे जाने वाले कर्मयोगी डॉ. नित्यानंद जी का 8 जनवरी 2016 को देहरादून में देहावसान हुआ।

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